महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! शत्रुसूदन! स्वर्गवासी देवताओंको कभी ग्लानि नहीं होती। उनमें क्रोध और लोभका भी अभाव होता है ॥ ४८ ॥
नित्यतुष्टाश्च ते राजन् प्राणिनः सुरवेश्मनि ।
नित्यपुष्पफलास्तत्र पादपा हरितच्छदाः ॥ ४९ ॥
राजन्! स्वर्गमें निवास करनेवाले प्राणी सदा संतुष्ट रहते हैं। वहाँके वृक्ष सर्वदा फल-फूलसे सम्पन्न और हरे पत्तोंसे सुशोभित रहते हैं ॥ ४९ ॥
पुष्करिण्यश्च विविधाः पद्मसौगन्धिकायुताः ।
शीतस्तत्र ववौ वायुः सुगन्धी जीवनः शुचिः ॥ ५० ॥
वहाँ सहस्रों सौगन्धिक कमलोंसे अलंकृत नाना प्रकारके सरोवर शोभा पाते हैं और शीतल, पवित्र, सुगन्धित एवं नवजीवनदायक वायु सदा बहती रहती है ॥ ५० ॥
सर्वरत्नविचित्रा च भूमिः पुष्पविभूषिता ।
मृगद्विजाश्च बहवो रुचिरा मधुरस्वराः ॥ ५१ ॥
विमानगामिनश्चात्र दृश्यन्ते बहवोऽम्बरे ।
ततोऽपश्यं वसून् रुद्रान् साध्यांश्च समरुद्गणान् ॥ ५२ ॥
आदित्यानश्विनौ चैव तान् सर्वान् प्रत्यपूजयम् ।
ते मां वीर्येण यशसा तेजसा च बलेन च ॥ ५३ ॥
अस्त्रैश्चाप्यन्वजानन्त संग्रामे विजयेन च ।
वहाँकी भूमि सब प्रकारके रत्नोंसे विचित्र शोभा धारण करती है और (सब ओर बिखरे हुए) पुष्प उस भूमिके लिये आभूषणका काम देते हैं। स्वर्गलोकमें बहुत-से मनोहर पशु और पक्षी देखे जाते हैं, जिनकी बोली बड़ी मधुर प्रतीत होती है। वहाँ अनेक देवता आकाशमें विमानोंपर विचरते दिखायी देते हैं। तदनन्तर मुझे वसु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण, आदित्य और अश्विनीकुमारोंके दर्शन हुए। मैंने उन सबके आगे मस्तक झुकाकर उनका सम्मान किया। उन सबने मुझे पराक्रमी, यशस्वी, तेजस्वी, बलवान्, अस्त्रवेत्ता और संग्राम-विजयी होनेका आशीर्वाद दिया ॥ ५१—५३ १/२ ॥
प्रविश्य तां पुरीं दिव्यां देवगन्धर्वपूजिताम् ॥ ५४ ॥
देवराजं सहस्राक्षमुपातिष्ठं कृताञ्जलिः ।
ददार्धमासनं प्रीतः शक्रो मे ददतां वरः ॥ ५५ ॥
तत्पश्चात् देव-गन्धर्वपूजित दिव्य अमरावतीपुरीमें प्रवेश करके मैंने हाथ जोड़कर सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रको प्रणाम किया। दाताओंमें श्रेष्ठ देवराज इन्द्रने प्रसन्न होकर मुझे अपने आधे सिंहासनपर स्थान दिया ॥ ५४-५५ ॥
बहुमानाच्च गात्राणि पस्पर्श मम वासवः ।
तत्राहं देवगन्धर्वैः सहितो भूरिदक्षिण ॥ ५६ ॥
अस्त्रार्थमवसं स्वर्गे शिक्षमाणोऽस्त्राणि भारत ।