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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 109

प्रत्युवाचाथ तद् रक्षो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ २२ ॥
‘तुम कौन हो, किसके पुत्र हो अथवा तुम्हारा कौन-सा कार्य सम्पादन किया जाय? यह सब बताओ।’ तब उस राक्षसने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ २२ ॥

अहं बकस्य वै भ्राता किर्मीर इति विश्रुतः ।
वनेऽस्मिन् काम्यके शून्ये निवसामि गतज्वरः ॥ २३ ॥
‘मैं बकका भाई हूँ, मेरा नाम किर्मीर है, इस निर्जन काम्यकवनमें निवास करता हूँ। यहाँ मुझे किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं है ॥ २३ ॥

युधि निर्जित्य पुरुषानाहारं नित्यमाचरन् ।
के यूयमभिसम्प्राप्ता भक्ष्यभूता ममान्तिकम् ।
युधि निर्जित्य वः सर्वान् भक्षयिष्ये गतज्वरः ॥ २४ ॥
‘यहाँ आये हुए मनुष्योंको युद्धमें जीतकर सदा उन्हींको खाया करता हूँ। तुमलोग कौन हो? जो स्वयं ही मेरा आहार बननेके लिये मेरे निकट आ गये? मैं तुम सबको युद्धमें परास्त करके निश्चिन्त हो अपना आहार बनाऊँगा’ ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरस्तु तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य दुरात्मनः ।
आचचक्षे ततः सर्वं गोत्रनामादि भारत ॥ २५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! उस दुरात्माकी बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उसे गोत्र एवं नाम आदि सब बातोंका परिचय दिया ॥ २५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

पाण्डवो धर्मराजोऽहं यदि ते श्रोत्रमागतः ।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैर्भीमसेनार्जुनादिभिः ॥ २६ ॥
हृतराज्यो वने वासं वस्तुं कृतमतिस्ततः ।
वनमभ्यागतो घोरमिदं तव परिग्रहम् ॥ २७ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**मैं पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हूँ। सम्भव है, मेरा नाम तुम्हारे कानोंमें भी पड़ा हो। इस समय मेरा राज्य शत्रुओंने जूएमें हरण कर लिया है। अतः मैं भीमसेन, अर्जुन आदि सब भाइयोंके साथ वनमें रहनेका निश्चय करके तुम्हारे निवासस्थान इस घोर काम्यकवनमें आया हूँ ॥ २६-२७ ॥

विदुर उवाच

किर्मीरस्त्वब्रवीदेनं दिष्ट्या देवैरिदं मम ।
उपपादितमद्येह चिरकालान्मनोगतम् ॥ २८ ॥