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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 960, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 960

न चाख्येयमिदं चापि मद्वाक्यं विजये त्वया ॥ २२ ॥
अर्जुनको धनुष-बाणके अभ्यासमें निरन्तर लगा हुआ देख द्रोणाचार्यने रसोइयेको एकान्तमें बुलाकर कहा—‘तुम अर्जुनको कभी अँधेरेमें भोजन न परोसना और मेरी यह बात भी अर्जुनसे कभी न कहना’ ॥ २१-२२ ॥
ततः कदाचिद् भुञ्जाने प्रववौ वायुरर्जुने ।
तेन तत्र प्रदीपः स दीप्यमानो विलोपितः ॥ २३ ॥
तदनन्तर एक दिन जब अर्जुन भोजन कर रहे थे, बड़े जोरसे हवा चलने लगी; उससे वहाँका जलता हुआ दीपक बुझ गया ॥ २३ ॥
भुङ्क्त एव तु कौन्तेयो नास्यादन्यत्र वर्तते ।
हस्तस्तेजस्विनस्तस्य अनुग्रहणकारणात् ॥ २४ ॥
उस समय भी कुन्तीनन्दन अर्जुन भोजन करते ही रहे। उन तेजस्वी अर्जुनका हाथ अभ्यासवश अँधेरेमें भी मुखसे अन्यत्र नहीं जाता था ॥ २४ ॥
तदभ्यासकृतं मत्वा रात्रावपि स पाण्डवः ।
योग्यां चक्रे महाबाहुर्धनुषा पाण्डुनन्दनः ॥ २५ ॥
उसे अभ्यासका ही चमत्कार मानकर महाबाहु पाण्डुनन्दन अर्जुन रातमें भी धनुर्विद्याका अभ्यास करने लगे ॥ २५ ॥
तस्य ज्यातलनिर्घोषं द्रोणः शुश्राव भारत ।
उपेत्य चैनमुत्थाय परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
भारत! उनके धनुषकी प्रत्यंचाका टंकार द्रोणने सोते समय सुना। तब वे उठकर उनके पास गये और उन्हें हृदयसे लगाकर बोले ॥ २६ ॥

द्रोण उवाच

प्रयतिष्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः ।
त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥
द्रोणने कहा—अर्जुन! मैं ऐसा करनेका प्रयत्न करूँगा, जिससे इस संसारमें दूसरा कोई धनुर्धर तुम्हारे समान न हो। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो द्रोणोऽर्जुनं भूयो हयेषु च गजेषु च ।
रथेषु भूमावपि च रणशिक्षामशिक्षयत् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर द्रोणाचार्य अर्जुनको पुनः घोड़ों, हाथियों, रथों तथा भूमिपर रहकर युद्ध करनेकी शिक्षा देने लगे ॥ २८ ॥
गदायुद्धेऽसिचर्यायां तोमरप्रासशक्तिषु ।
द्रोणः संकीर्णयुद्धे च शिक्षयामास कौरवान् ॥ २९ ॥