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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 953

इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया। गंगानन्दन! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी ॥ ५२-५३ ॥

अथ पिष्टोदकेनैवं लोभयन्ति कुमारकाः ।
पीत्वा पिष्टरसं बालः क्षीरं पीतं मयापि च ॥ ५४ ॥
ननर्तोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद् विमोहितः ।
तं दृष्ट्वा नृत्यमानं तु बालैः परिवृतं सुतम् ॥ ५५ ॥
हास्यतामुपसम्प्राप्तं कश्मलं तत्र मेऽभवत् ।
द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति ॥ ५६ ॥

मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि ‘मैंने दूध पी लिया’। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, ‘इस धनहीन द्रोणको धिक्कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता ॥ ५४—५६ ॥

पिष्टोदकं सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया ।
नृत्यति स्म मुदाविष्टः क्षीरं पीतं मयाप्युत ॥ ५७ ॥
इति सम्भाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत् ।
आत्मानं चात्मना गर्हन् मनसेदं व्यचिन्तयम् ॥ ५८ ॥
अपि चाहं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे ।
परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्यां धनेप्सया ॥ ५९ ॥

‘जिसका बेटा दूधकी लालसासे आटा मिला हुआ जल पीकर आनन्दमग्न हो यह कहता हुआ नाच रहा है कि ‘मैंने भी दूध पी लिया।’ इस प्रकारकी बातें करनेवाले लोगोंकी आवाज मेरे कानोंमें पड़ी तो मेरी बुद्धि स्थिर न रह सकी। मैं स्वयं ही अपने-आपकी निन्दा करता हुआ मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगा—‘मुझे दरिद्र जानकर पहलेसे ही ब्राह्मणोंने मेरा साथ छोड़ दिया। मैं धनाभावके कारण निन्दित होकर उपवास भले ही कर लूँगा, परंतु धनके लोभसे दूसरोंकी सेवा, जो अत्यन्त पापपूर्ण कर्म है, कदापि नहीं कर सकता’ ॥ ५७—५९ ॥

इति मत्वा प्रियं पुत्रं भीष्मादाय ततो ह्यहम् ।
पूर्वस्नेहानुरागित्वात् सदारः सौमकिं गतः ॥ ६० ॥

भीष्मजी! ऐसा निश्चय करके मैं अपने प्रिय पुत्र और पत्नीको साथ लेकर पहलेके स्नेह और अनुरागके कारण राजा द्रुपदके यहाँ गया ॥ ६० ॥

अभिषिक्तं तु श्रुत्वैव कृतार्थोऽस्मीति चिन्तयन् ।
प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम् ॥ ६१ ॥