महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘महाबाहो! तुमने जो यह शक्तिपूर्ण रस पीया है, इसके कारण तुम्हारा बल दस हजार हाथियोंके समान होगा और तुम युद्धमें अजेय हो जाओगे ।। २२ ।।
गच्छाद्य त्वं च स्वगृहं स्नातो दिव्यैरिमैर्जलैः ।
भ्रातरस्तेऽनुतप्यन्ति त्वां विना कुरुपुङ्गव ।। २३ ।।
‘आज तुम इस दिव्य जलसे स्नान करो और अपने घर लौट जाओ। कुरुश्रेष्ठ! तुम्हारे बिना तुम्हारे सब भाई निरन्तर दुःख और चिन्तामें डूबे रहते हैं’ ।। २३ ।।
ततः स्नातो महाबाहुः शुचिः शुक्लाम्बरस्रजः ।
ततो नागस्य भवने कृतकौतुकमङ्गलः ।। २४ ।।
ओषधीभिर्विषघ्नीभिः सुरभीभिर्विशेषतः ।
भुक्तवान् परमान्नं च नागैर्दत्तं महाबलः ।। २५ ।।
तब महाबाहु भीमसेन स्नान करके शुद्ध हो गये। उन्होंने श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण की। तत्पश्चात् नागराजके भवनमें उनके लिये कौतुक एवं मंगलाचार सम्पन्न किये गये। फिर उन महाबली भीमने विष-नाशक सुगन्धित ओषधियोंके साथ नागोंकी दी हुई खीर खायी ।। २४-२५ ।।
पूजितो भुजगैर्वीर आशीर्भिश्वाभिनन्दितः ।
दिव्याभरणसंछन्नो नागानामन्त्र्य पाण्डवः ।। २६ ।।
उदतिष्ठत् प्रहृष्टात्मा नागलोकादरिंदमः ।
उत्क्षिप्तः स तु नागेन जलाज्जलरुहेक्षणः ।। २७ ।।
तस्मिन्नेव वनोद्देशे स्थापितः कुरुनन्दनः ।
ते चान्तर्दधिरे नागाः पाण्डवस्यैव पश्यतः ।। २८ ।।
इसके बाद नागोंने वीर भीमसेनका आदर-सत्कार करके उन्हें शुभाशीर्वादोंसे प्रसन्न किया। दिव्य आभूषणोंसे विभूषित शत्रुदमन भीमसेन नागोंकी आज्ञा ले प्रसन्नचित्त हो नागलोकसे जानेको उद्यत हुए। तब किसी नागने कमलनयन कुरुनन्दन भीमको जलसे ऊपर उठाकर उसी वनमें (गंगातटवर्ती प्रमाणकोटिमें) रख दिया। फिर वे नाग पाण्डुपुत्र भीमके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये ।। २६—२८ ।।
तत उत्थाय कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः ।
आजगाम महाबाहुर्मातुरन्तिकमञ्जसा ।। २९ ।।
तब महाबली कुन्तीकुमार महाबाहु भीमसेन वहाँसे उठकर शीघ्र ही अपनी माताके समीप आ गये ।। २९ ।।
ततोऽभिवाद्य जननीं ज्येष्ठं भ्रातरमेव च ।
कनीयसः समाघ्राय शिरःस्वरिविमर्दनः ।। ३० ।।
तदनन्तर शत्रुमर्दन भीमने माता और बड़े भाईको प्रणाम करके स्नेहपूर्वक छोटे भाइयोंका सिर सूँघा ।। ३० ।।