महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 927, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिःश्वेशोऽस्माननुप्राप्तः स च दष्टोऽन्वबुध्यत ।
ससंज्ञश्चापि संवृत्तश्छित्त्वा बन्धनमाशु नः ॥ ६२ ॥
पोथयन्तं महाबाहुं त्वं वै तं ज्ञातुमर्हसि ।
'वह हमलोगोंके पास बेहोशीकी हालतमें आया था, किंतु हमारे डँसनेपर जाग उठा और होशमें आ गया। होशमें आनेपर तो वह महाबाहु अपने सारे बन्धनोंको शीघ्र तोड़कर हमें पछाड़ने लगा है। आप चलकर उसे पहचानें' ॥ ६२ १/२ ॥
ततो वासुकिरभ्येत्य नागैरनुगतस्तदा ॥ ६३ ॥
पश्यति स्म महाबाहुं भीमं भीमपराक्रमम् ।
आर्यकेण च दृष्टः स पृथाया आर्यकेण च ॥ ६४ ॥
तदा दौहित्रदौहित्रः परिष्वक्तः सुपीडितम् ।
सुप्रीतश्चाभवत् तस्य वासुकिः स महायशाः ॥ ६५ ॥
अब्रवीत् तं च नागेन्द्रः किमस्य क्रियतां प्रियम् ।
धनौघो रत्ननिचयो वसु चास्य प्रदीयताम् ॥ ६६ ॥
तब वासुकिने उन नागोंके साथ आकर भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीमसेनको देखा। उसी समय नागराज आर्यकने भी उन्हें देखा, जो पृथाके पिता शूरसेनके नाना थे। उन्होंने अपने दौहित्रके दौहित्रको कसकर छातीसे लगा लिया। महायशस्वी नागराज वासुकि भी भीमसेनपर बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'इनका कौन-सा प्रिय कार्य किया जाय? इन्हें धन, सोना और रत्नोंकी राशि भेंट की जाय' ॥ ६३—६६ ॥
एवमुक्तस्तदा नागो वासुकिं प्रत्यभाषत ।
यदि नागेन्द्र तुष्टोऽसि किमस्य धनसंचयैः ॥ ६७ ॥
उनके यों कहनेपर आर्यक नागने वासुकिसे कहा—'नागराज! यदि आप प्रसन्न हैं तो यह धनराशि लेकर क्या करेगा' ॥ ६७ ॥
रसं पिबेत् कुमारोऽयं त्वयि प्रीते महाबलः ।
बलं नागसहस्रस्य यस्मिन् कुण्डे प्रतिष्ठितम् ॥ ६८ ॥
'आपके संतुष्ट होनेपर तो इस महाबली राजकुमारको आपकी आज्ञासे उस कुण्डका रस पीना चाहिये, जिससे एक हजार हाथियोंका बल प्राप्त होता है ॥ ६८ ॥
यावत् पिबति बालोऽयं तावदस्मै प्रदीयताम् ।
एवमस्त्विति तं नागं वासुकिः प्रत्यभाषत ॥ ६९ ॥
'यह बालक जितना रस पी सके, उतना इसे दिया जाय।' यह सुनकर वासुकिने आर्यक नागसे कहा 'ऐसा ही हो' ॥ ६९ ॥
ततो भीमस्तदा नागैः कृतस्वस्त्ययनः शुचिः ।
प्राङ्मुखश्चोपविष्टश्च रसं पिबति पाण्डवः ॥ ७० ॥