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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 904, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 904

ऋषीणां च पृथायाश्च नमस्कृत्य पुनः पुनः ।
आयासकृपणा माद्री प्रत्युवाच पृथां तथा ॥
धन्या त्वमसि वार्ष्णेयि नास्ति स्त्री सदृशी त्वया ।
वीर्यं तेजश्च योगं च माहात्म्यं च यशस्विनाम् ॥
कुन्ति द्रक्ष्यसि पुत्राणां पञ्चानाममितौजसाम् ।
ऋषीणां संनिधावेषां मया वागभ्युदीरिता ॥
स्वर्गं दिदृक्षमाणाया ममैषा न वृथा भवेत् ।
आर्या चाप्यभिवाद्या च मम पूज्या च सर्वतः ॥
ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वं देवि भूषिता स्वगुणैः शुभैः ।
अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि त्वया यादवनन्दिनि ॥
धर्मं स्वर्गं च कीर्तिं च त्वत्कृतेऽहमवाप्नुयाम् ।
यथा तथा विधत्स्वेह मा च कार्षीर्विचारणाम् ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! तत्पश्चात् माद्रीने ऋषियों तथा कुन्तीको बारंबार नमस्कार करके, क्लेशसे क्लान्त होकर कुन्तीदेवीसे दीनतापूर्वक कहा—'वृष्णिकुलनन्दिनि! आप धन्य हैं। आपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है; क्योंकि आपको इन अमिततेजस्वी तथा यशस्वी पाँचों पुत्रोंके बल, पराक्रम, तेज, योगबल तथा माहात्म्य देखनेका सौभाग्य प्राप्त होगा। मैंने स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा रखकर इन महर्षियोंके समीप जो यह बात कही है, वह कदापि मिथ्या न हो। देवि! आप मेरी गुरु, वन्दनीया तथा पूजनीया हैं; अवस्थामें बड़ी तथा गुणोंमें भी श्रेष्ठ हैं। समस्त नैसर्गिक सद्गुण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। यादवनन्दिनि! अब मैं आपकी आज्ञा चाहती हूँ। आपके प्रयत्नद्वारा जैसे भी मुझे धर्म, स्वर्ग तथा कीर्तिकी प्राप्ति हो, वैसा सहयोग आप इस अवसरपर करें। मनमें किसी दूसरे विचारको स्थान न दें'।
बाष्पसंदिग्धया वाचा कुन्त्युवाच यशस्विनी ॥
अनुज्ञातासि कल्याणि त्रिदिवे संगमोऽस्तु ते ।
भर्त्रा सह विशालाक्षि क्षिप्रमद्यैव भामिनि ॥
संगता स्वर्गलोके त्वं रमेथाः शाश्वतीः समाः ॥)
राज्ञः शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् ।
दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदार्ये प्रियं कुरु ॥ २९ ॥
तब यशस्विनी कुन्तीने बाष्पगद्गद वाणीमें कहा—'कल्याणि! मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी। विशाललोचने! तुम्हें आज ही स्वर्गलोकमें पतिका समागम प्राप्त हो। भामिनि! तुम स्वर्गमें पतिसे मिलकर अनन्त वर्षोंतक प्रसन्न रहो।'
माद्री बोली—'मेरे इस शरीरको महाराजके शरीरके साथ ही अच्छी प्रकार ढँककर दग्ध कर देना चाहिये। बड़ी बहिन! आप मेरा यह प्रिय कार्य कर दें ॥ २९ ॥