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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 898, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 898

‘वे तो उस शापका चिन्तन करते हुए सदा दीन और उदास बने रहते थे, फिर तुझको एकान्तमें पाकर उनके मनमें कामजनित हर्ष कैसे उत्पन्न हुआ? ।। २० ।।
धन्या त्वमसि बाह्लीकि मत्तो भाग्यतरा तथा ।
दृष्टवत्यसि यद् वक्त्रं प्रहृष्टस्य महीपतेः ॥ २१ ॥
‘बाह्लीकराजकुमारी! तुम धन्य हो, मुझसे बड़भागिनी हो; क्योंकि तुमने हर्षोल्लाससे भरे हुए महाराजके मुखचन्द्रका दर्शन किया है’ ।। २१ ।।

माद्र्युवाच

विलपन्त्या मया देवि वार्यमाणेण चासकृत् ।
आत्मा न वारितोऽनेन सत्यं दिष्टं चिकीर्षुणा ॥ २२ ॥
**माद्री बोली—**महारानी! मैंने रोते-बिलखते बार-बार महाराजको रोकनेकी चेष्टा की; परंतु वे तो उस शापजनित दुर्भाग्यको मोहके कारण मानो सत्य करना चाहते थे, इसलिये अपने-आपको रोक न सके ।। २२ ।।

वैशम्पायन उवाच

(तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कुन्ती शोकाग्नितापिता ।
पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥
निश्चेष्टा पतिता भूमौ मोहान्नैव चचाल सा ॥
कुन्तीमुत्थाप्य माद्री च मोहेनाविष्टचेतनाम् ।
एह्येहीति तां कुन्तीं दर्शयामास कौरवम् ॥
पादयोः पतिता कुन्ती पुनरुत्थाय भूमिपम् ।
सस्मितेन तु वक्त्रेण गदन्तमिव भारत ।
परिरभ्य तदा मोहाद् विललापाकुलेन्द्रिया ॥
माद्री चापि समालिङ्ग्य राजानं विललाप सा ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! माद्रीका यह वचन सुनकर कुन्ती शोकाग्निसे संतप्त हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी और गिरते ही मूर्च्छा आ जानेके कारण निश्चेष्ट पड़ी रही, हिल-डुल भी न सकी। वह मूर्च्छावश अचेत हो गयी थी। माद्रीने उसे उठाया और कहा—‘बहिन! आइये, आइये!’ यों कहकर उसने कुन्तीको कुरुराज पाण्डुका दर्शन कराया। कुन्ती उठकर पुनः महाराज पाण्डुके चरणोंमें गिर पड़ी। महाराजके मुखपर मुसकराहट थी और ऐसा जान पड़ता था मानो वे अभी-अभी कोई बात कहने जा रहे हैं। उस समय मोहवश उन्हें हृदयसे लगाकर कुन्ती विलाप करने लगी। उसकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयी थीं। इसी प्रकार माद्री भी राजाका आलिंगन करके करुण विलाप करने लगी।

तं तथाधिगतं पाण्डुमृषयः सह चारणैः ।