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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 853, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 853

उस समय नेत्रोंसे गरम-गरम आँसुओंकी धारा बहाते हुए वे सेवक राजा पाण्डुको
छोड़कर और बचा हुआ सारा धन लेकर तुरंत हस्तिनापुरको चले गये ॥ ४३ ॥
ते गत्वा नगरं राज्ञो यथावृत्तं महात्मनः ।
कथयाञ्चक्रिरे राजंस्तद् धनं विविधं ददुः ॥ ४४ ॥
उन्होंने हस्तिनापुरमें जाकर महात्मा राजा पाण्डुका सारा समाचार राजा धृतराष्ट्रसे
ज्यों-का-त्यों कह सुनाया और वह नाना प्रकारका धन धृतराष्ट्रको ही सौंप दिया ॥ ४४ ॥
श्रुत्वा तेभ्यस्ततः सर्वं यथावृत्तं महावने ।
धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठः पाण्डुमेवान्वशोचत ॥ ४५ ॥
फिर उन सेवकोंसे उस महान् वनमें पाण्डुके साथ घटित हुई सारी घटनाओंको यथावत्
सुनकर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र सदा पाण्डुकी ही चिन्तामें दुःखी रहने लगे ॥ ४५ ॥
न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् ।
भ्रातृशोकसमाविष्टस्तमेवार्थं विचिन्तयन् ॥ ४६ ॥
शय्या, आसन और नाना प्रकारके भोगोंमें कभी उनकी रुचि नहीं होती थी। वे भाईके
शोकमें मग्न हो सदा उन्हींकी बात सोचते रहते थे ॥ ४६ ॥
राजपुत्रस्तु कौरव्य पाण्डुर्मूलफलाशनः ।
जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम् ॥ ४७ ॥
जनमेजय! राजकुमार पाण्डु फल-मूलका आहार करते हुए अपनी दोनों पत्नियोंके
साथ वहाँसे नागशत नामक पर्वतपर चले गये ॥ ४७ ॥
स चैत्ररथमासाद्य कालकूटमतीत्य च ।
हिमवन्तमतिक्रम्य प्रययौ गन्धमादनम् ॥ ४८ ॥
तत्पश्चात् चैत्ररथ नामक वनमें जाकर कालकूट और हिमालय पर्वतको लाँघते हुए वे
गन्धमादनपर चले गये ॥ ४८ ॥
रक्ष्यमाणो महाभूतैः सिद्धैश्च परमर्षिभिः ।
उवास स महाराज समेषु विषमेषु च ॥ ४९ ॥
इन्द्रद्युम्नसरः प्राप्य हंसकूटमतीत्य च ।
शतशृङ्गे महाराज तापसः समतप्यत ॥ ५० ॥
महाराज! उस समय महाभूत, सिद्ध और महर्षिगण उनकी रक्षा करते थे। वे ऊँची-
नीची जमीनपर सो लेते थे। इन्द्रद्युम्न सरोवरपर पहुँचकर तथा उसके बाद हंसकूटको
लाँघते हुए वे शतशृंग पर्वतपर जा पहुँचे। जनमेजय! वहाँ वे तपस्वी-जीवन बिताते हुए
भारी तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ ४९-५० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि
पाण्डुचरितेऽष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥