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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 831, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 831

प्राप्तः स्वगुणतो राज्यं न तस्मिन् वाच्यमस्ति नः ॥ ३१ ॥
‘आदरणीय गुरुजनो! हमारे कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजकुमार युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ हैं। वे अपने गुणोंसे राज्यको पानेके अधिकारी हो चुके हैं। उनके विषयमें हमें कुछ नहीं कहना है ॥ ३१ ॥
अयं त्वनन्तरस्तस्मादपि राजा भविष्यति ।
एतद् विब्रूत मे तथ्यं यदत्र भविता ध्रुवम् ॥ ३२ ॥
‘किंतु उनके बाद मेरा यह पुत्र ही ज्येष्ठ है। क्या यह भी राजा बन सकेगा? इस बातपर विचार करके आपलोग ठीक-ठीक बतायें। जो बात अवश्य होनेवाली है, उसे स्पष्ट कहें’ ॥ ३२ ॥
वाक्यस्यैतस्य निधने दिक्षु सर्वासु भारत ।
क्रव्यादाः प्राणदन् घोराः शिवाश्चाशिवशंसिनः ॥ ३३ ॥
जनमेजय! धृतराष्ट्रकी यह बात समाप्त होते ही चारों दिशाओंमें भयंकर मांसाहारी जीव गर्जना करने लगे। गीदड़ अमंगलसूचक बोली बोलने लगे ॥ ३३ ॥
लक्षयित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वशः ।
तेऽब्रुवन् ब्राह्मणा राजन् विदुरश्च महामतिः ॥ ३४ ॥
यथेमानि निमित्तानि घोराणि मनुजाधिप ।
उत्थितानि सुते जाते ज्येष्ठे ते पुरुषर्षभ ॥ ३५ ॥
व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितेष सुतस्तव ।
तस्य शान्तिः परित्यागे गुप्तावपनयो महान् ॥ ३६ ॥
राजन्! सब ओर होनेवाले उन भयानक अप-शकुनोंको लक्ष्य करके ब्राह्मणलोग तथा परम बुद्धिमान् विदुरजी इस प्रकार बोले—‘नरश्रेष्ठ नरेश्वर! आपके ज्येष्ठ पुत्रके जन्म लेनेपर जिस प्रकार ये भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उनसे स्पष्ट जान पड़ता है कि आपका यह पुत्र समूचे कुलका संहार करनेवाला होगा। यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो सब विघ्नोंकी शान्ति हो जायगी और यदि इसकी रक्षा की गयी तो आगे चलकर बड़ा भारी उपद्रव खड़ा होगा ॥ ३४—३६ ॥
शतमेकोनमप्यस्तु पुत्राणां ते महीपते ।
त्यजैनमेकं शान्तिं चेत् कुलस्येच्छसि भारत ॥ ३७ ॥
‘महीपते! आपके निन्यानबे पुत्र ही रहें; भारत! यदि आप अपने कुलकी शान्ति चाहते हैं तो इस एक पुत्रको त्याग दें ॥ ३७ ॥
एकेन कुरु वै क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा ।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ॥ ३८ ॥
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।
स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः ॥ ३९ ॥