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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 820, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 820

सेनासहित राजा पाण्डुने सामने आये हुए सैन्यसहित नरपतियोंकी सारी सेनाएँ नष्ट कर दीं और उन्हें अपने अधीन करके कौरवोंके आज्ञापालनमें नियुक्त कर दिया ॥ ३१ ॥
तेन ते निर्जिताः सर्वे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ।
तमेकं मेनिरे शूरं देवेष्विव पुरंदरम् ॥ ३२ ॥
पाण्डुके द्वारा परास्त हुए समस्त भूपालगण देवताओंमें इन्द्रकी भाँति इस पृथ्वीपर सब मनुष्योंमें एकमात्र उन्हींको शूरवीर मानने लगे ॥ ३२ ॥
तं कृताञ्जलयः सर्वे प्रणता वसुधाधिपाः ।
उपाजग्मुर्धनं गृह्य रत्नानि विविधानि च ॥ ३३ ॥
भूतलके समस्त राजाओंने उनके सामने हाथ जोड़कर मस्तक टेक दिये और नाना प्रकारके रत्न एवं धन लेकर उनके पास आये ॥ ३३ ॥
मणिमुक्ताप्रवालं च सुवर्णं रजतं बहु ।
गोरत्नान्यश्वरत्नानि रथरत्नानि कुञ्जरान् ॥ ३४ ॥
खरोष्ट्रमहिषींश्चैव यच्च किंचिदजाविकम् ।
कम्बलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च ।
तत् सर्वं प्रतिजग्राह राजा नागपुराधिपः ॥ ३५ ॥
राजाओंके दिये हुए ढेर-के-ढेर मणि, मोती, मूँगे, सुवर्ण, चाँदी, गोरत्न, अश्वरत्न, रथरत्न, हाथी, गदहे, ऊँट, भैंसें, बकरे, भेड़ें, कम्बल, मृगचर्म, रत्न, रंकु मृगके चर्मसे बने हुए बिछौने आदि जो कुछ भी सामान प्राप्त हुए, उन सबको हस्तिनापुराधीश राजा पाण्डुने ग्रहण कर लिया ॥ ३४-३५ ॥
तदादाय ययौ पाण्डुः पुनर्मुदितवाहनः ।
हर्षयिष्यन् स्वराष्ट्राणि पुरं च गजसाह्वयम् ॥ ३६ ॥
वह सब लेकर महाराज पाण्डु अपने राष्ट्रके लोगोंका हर्ष बढ़ाते हुए पुनः हस्तिनापुर चले आये। उस समय उनकी सवारीके अश्व आदि भी बहुत प्रसन्न थे ॥ ३६ ॥
शन्तनो राजसिंहस्य भरतस्य च धीमतः ।
प्रणष्टः कीर्तिजः शब्दः पाण्डुना पुनराहृतः ॥ ३७ ॥
राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी शन्तनु तथा परम बुद्धिमान् भरतकी कीर्ति-कथा जो नष्ट-सी हो गयी थी, उसे महाराज पाण्डुने पुनरुज्जीवित कर दिया ॥ ३७ ॥
ये पुरा कुरुराष्ट्राणि जहुः कुरुधनानि च ।
ते नागपुरसिंहेन पाण्डुना करदीकृताः ॥ ३८ ॥
जिन राजाओंने पहले कुरुदेशके धन तथा कुरुराष्ट्रका अपहरण किया था, उनको हस्तिनापुरके सिंह पाण्डुने करद बना दिया ॥ ३८ ॥
इत्यभाषन्त राजानो राजामात्याश्च संगताः ।
प्रतीतमनसो हृष्टाः पौरजानपदैः सह ॥ ३९ ॥

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