महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 772, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै ।। ६ ।।
तस्मात् सुभृशमाश्वस्य त्वयि धर्मभृतां वर ।
कार्ये त्वां विनियोक्ष्यामि तच्छ्रुत्वा कर्तुमर्हसि ।। ७ ।।
‘अतः धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भीष्म! तुमपर अत्यन्त विश्वास रखकर ही मैं तुम्हें एक आवश्यक कार्यमें लगाना चाहती हूँ। तुम पहले उसे सुन लो; फिर उसका पालन करनेकी चेष्टा करो ।। ७ ।।
मम पुत्रस्तव भ्राता वीर्यवान् सुप्रियश्च ते ।
बाल एव गतः स्वर्गमपुत्रः पुरुषर्षभ ।। ८ ।।
इमे महिष्यौ भ्रातुस्ते काशिराजसुते शुभे ।
रूपयौवनसम्पन्ने पुत्रकामे च भारत ।। ९ ।।
तयोरुत्पादयापत्यं संतानाय कुलस्य नः ।
मन्नियोगान्महाबाहो धर्मं कर्तुमिहार्हसि ।। १० ।।
‘मेरा पुत्र और तुम्हारा भाई विचित्रवीर्य जो पराक्रमी होनेके साथ ही तुम्हें अत्यन्त प्रिय था, छोटी अवस्थामें ही स्वर्गवासी हो गया। नरश्रेष्ठ! उसके कोई पुत्र नहीं हुआ था। तुम्हारे भाईकी ये दोनों सुन्दरी रानियाँ, जो काशिराजकी कन्याएँ हैं, मनोहर रूप और युवावस्थासे सम्पन्न हैं। इनके हृदयमें पुत्र पानेकी अभिलाषा है। भारत! तुम हमारे कुलकी संतानपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये स्वयं ही इन दोनोंके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करो। महाबाहो! मेरी आज्ञासे यह धर्मकार्य तुम अवश्य करो ।। ८—१० ।।
राज्ये चैवाभिषिञ्चस्व भारताननुशाधि च ।
दारांश्च कुरु धर्मेण मा निमज्जीः पितामहान् ।। ११ ।।
‘राज्यपर अपना अभिषेक करो और भारतीय प्रजाका पालन करते रहो। धर्मके अनुसार विवाह कर लो; पितरोंको नरकमें न गिरने दो’ ।। ११ ।।
वैशम्पायन उवाच
तथोच्यमानो मात्रा स सुहृद्भिश्च परंतपः ।
इत्युवाचाथ धर्मात्मा धर्म्यमेवोत्तरं वचः ।। १२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! माता और सुहृदोंके ऐसा कहनेपर शत्रुदमन धर्मात्मा भीष्मने यह धर्मानुकूल उत्तर दिया— ।। १२ ।।
असंशयं परो धर्मस्त्वया मातरुदाहृतः ।
राज्यार्थे नाभिषिञ्चेयं नोपेयां जातु मैथुनम् ।
त्वमपत्यं प्रति च मे प्रतिज्ञां वेत्थ वै पराम् ।। १३ ।।
जानासि च यथावृत्तं शुल्कहेतोस्त्वदन्तरे ।
स सत्यवति सत्यं ते प्रतिजानाम्यहं पुनः ।। १४ ।।