महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदिदं कारणं तात सर्वमाख्यातमञ्जसा ॥)
‘भारत! महाप्राज्ञ! इस बातमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि संतान, कर्म और विद्या—ये तीन ज्योतियाँ हैं; इनमें भी जो संतान है, उसका महत्त्व सबसे अधिक है। यही वेदत्रयी पुराण तथा देवताओंका भी सनातन मत है। तात! मेरी चिन्ताका जो कारण है, वह सब तुम्हें स्पष्ट बता दिया ।। ६९ ।।
त्वं च शूरः सदामर्षी शस्त्रनित्यश्च भारत ।
नान्यत्र युद्धात् तस्मात् ते निधनं विद्यते क्वचित् ॥ ७० ॥
‘भारत! तुम शूरवीर हो। तुम कभी किसीकी बात सहन नहीं कर सकते और सदा अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें ही लगे रहते हो; अतः युद्धके सिवा और किसी कारणसे कभी तुम्हारी मृत्यु होनेकी सम्भावना नहीं है ।। ७० ।।
सोऽस्मि संशयमापन्नस्त्वयि शान्ते कथं भवेत् ।
इति ते कारणं तात दुःखस्योक्तमशेषतः ॥ ७१ ॥
‘इसीलिये मैं इस संदेहमें पड़ा हूँ कि तुम्हारे शान्त हो जानेपर इस वंशपरम्पराका निर्वाह कैसे होगा? तात! यही मेरे दुःखका कारण है; वह सब-का-सब तुम्हें बता दिया’ ।। ७१ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषतः ।
देवव्रतो महाबुद्धिः प्रज्ञया चान्वचिन्तयत् ॥ ७२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजाके दुःखका वह सारा कारण जानकर परम बुद्धिमान् देवव्रतने अपनी बुद्धिसे भी उसपर विचार किया ।। ७२ ।।
अभ्यगच्छत् तदैवाशु वृद्धामात्यं पितुर्हितम् ।
तमपृच्छत् तदाभ्येत्य पितुस्तच्छोककारणम् ॥ ७३ ॥
तदनन्तर वे उसी समय तुरंत अपने पिताके हितैषी बूढ़े मन्त्रीके पास गये और पिताके शोकका वास्तविक कारण क्या है, इसके विषयमें उनसे पूछताछ की ।। ७३ ।।
तस्मै स कुरुमुख्याय यथावत् परिपृच्छते ।
वरं शशंस कन्यां तामुद्दिश्य भरतर्षभ ॥ ७४ ॥
भरतश्रेष्ठ! कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष देवव्रतके भलीभाँति पूछनेपर वृद्ध मन्त्रीने बताया कि महाराज एक कन्यासे विवाह करना चाहते हैं ।। ७४ ।।
(सूतं भूयोऽपि संतप्त आह्वयामास वै पितुः ॥
सूतस्तु कुरुमुख्यस्य उपयातस्तदाज्ञया ।
तमुवाच महाप्राज्ञो भीष्मो वै सारथिं पितुः ॥