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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 740, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 740

तदद्भुतं ततो दृष्ट्वा तत्र राजा स शान्तनुः ।
शङ्कमानः सुतं गङ्गामब्रवीद् दर्शयेति ह ॥ ३० ॥
यह अद्भुत बात देखकर राजा शान्तनुको कुछ संदेह हुआ और उन्होंने गंगासे अपने पुत्रको दिखानेको कहा ॥ ३० ॥
दर्शयामास तं गङ्गा बिभ्रती रूपमुत्तमम् ।
गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ तं कुमारमलंकृतम् ॥ ३१ ॥
तब गंगाजी परम सुन्दर रूप धारण करके अपने पुत्रका दाहिना हाथ पकड़े सामने आयीं और दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कुमार देवव्रतको दिखाया ॥ ३१ ॥
अलंकृतामाभरणैर्विरजोऽम्बरसंवृताम् ।
दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात् स शान्तनुः ॥ ३२ ॥
गंगा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत हो स्वच्छ सुन्दर साड़ी पहने हुई थीं। इससे उनका अनुपम सौन्दर्य इतना बढ़ गया था कि पहलेकी देखी होनेपर भी राजा शान्तनु उन्हें पहचान न सके ॥ ३२ ॥

गङ्गोवाच

यं पुत्रमष्टमं राजंस्त्वं पुरा मय्यविन्दथाः ।
स चायं पुरुषव्याघ्र सर्वास्त्रविदनुत्तमः ॥ ३३ ॥
**गंगाजीने कहा—**महाराज! पूर्वकालमें आपने अपने जिस आठवें पुत्रको मेरे गर्भसे प्राप्त किया था, यह वही है। पुरुषसिंह! यह सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें अत्यन्त उत्तम है ॥ ३३ ॥