महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएतदाख्याय सा देवी तत्रैवान्तरधीयत ।
आदाय च कुमारं तं जगामाथ यथेप्सितम् ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ये सब बातें बताकर गंगादेवी उस नवजात शिशुको साथ ले वहीं अन्तर्धान हो गयीं और अपने अभीष्ट स्थानको चली गयीं ॥ ४६ ॥
स तु देवव्रतो नाम गाङ्गेय इति चाभवत् ।
द्युनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ॥ ४७ ॥
उस बालकका नाम हुआ देवव्रत। कुछ लोग गांगेय भी कहते थे। द्यु* नामवाले वसु शान्तनुके पुत्र होकर गुणोंमें उनसे भी बढ़ गये ॥ ४७ ॥
शान्तनुश्चापि शोकार्तो जगाम स्वपुरं ततः ।
तस्याहं कीर्तयिष्यामि शान्तनोरधिकान् गुणान् ॥ ४८ ॥
इधर शान्तनु शोकसे आतुर हो पुनः अपने नगरको लौट गये। शान्तनुके उत्तम गुणोंका मैं आगे चलकर वर्णन करूँगा ॥ ४८ ॥
महाभाग्यं च नृपतेर्भारतस्य महात्मनः ।
यस्येतिहासो द्युतिमान् महाभारतमुच्यते ॥ ४९ ॥
उन भरतवंशी महात्मा नरेशके महान् सौभाग्यका भी मैं वर्णन करूँगा, जिनका उज्ज्वल इतिहास 'महाभारत' नामसे विख्यात है ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि आपवोपाख्याने नवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आपवोपाख्यानविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५१ श्लोक हैं)
* 'द्यु' का ही नाम 'द्यो' है, जैसा कि पहले कई बार आ चुका है।