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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 722, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 722

‘शान्तनो! पूर्वकालमें मेरे समीप एक दिव्य नारी आयी थी। उसका आगमन तुम्हारे कल्याणके लिये ही हुआ था। बेटा! यदि वह सुन्दरी कभी एकान्तमें तुम्हारे पास आवे, तुम्हारे प्रति कामभावसे युक्त हो और तुमसे पुत्र पानेकी इच्छा रखती हो, तो तुम उत्तम रूपसे सुशोभित उस दिव्य नारीसे ‘अंगने! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? इत्यादि प्रश्न न करना ।। २१-२२ ।।
यच्च कुर्यान्न तत् कर्म सा प्रष्टव्या त्वयानघ ।
मन्नियोगाद् भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम् ।। २३ ।।
‘अनघ! वह जो कार्य करे, उसके विषयमें भी तुम्हें कुछ पूछताछ नहीं करनी चाहिये। यदि वह तुम्हें चाहे, तो मेरी आज्ञासे उसे अपनी पत्नी बना लेना।’ ये बातें राजा प्रतीपने अपने पुत्रसे कहीं ।। २३ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवं संदिश्य तनयं प्रतीपः शान्तनुं तदा ।
स्वे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह ।। २४ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**अपने पुत्र शान्तनुको ऐसा आदेश देकर राजा प्रतीपने उसी समय उन्हें अपने राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं वनमें प्रवेश किया ।। २४ ।।
स राजा शान्तनुर्धीमान् देवराजसमद्युतिः ।
बभूव मृगयाशीलः शान्तनुर्वनगोचरः ।। २५ ।।
बुद्धिमान् राजा शान्तनु देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे हिंसक पशुओंको मारनेके उद्देश्यसे वनमें घूमते रहते थे ।। २५ ।।
स मृगान् महिषांश्चैव विनिघ्नन् राजसत्तमः ।
गङ्गामनुचचारैकः सिद्धचारणसेविताम् ।। २६ ।।
राजाओंमें श्रेष्ठ शान्तनु हिंसक पशुओं और जंगली भैंसोंको मारते हुए सिद्ध एवं चारणोंसे सेवित गंगाजीके तटपर अकेले ही विचरण करते थे ।। २६ ।।
स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम् ।
जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ।। २७ ।।
महाराज जनमेजय! एक दिन उन्होंने एक परम सुन्दरी नारी देखी, जो अपने तेजस्वी शरीरसे ऐसी प्रकाशित हो रही थी, मानो साक्षात् लक्ष्मी ही दूसरा शरीर धारण करके आ गयी हो ।। २७ ।।
सर्वानवद्यां सुदतीं दिव्याभरणभूषिताम् ।
सूक्ष्माम्बरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम् ।। २८ ।।
उसके सारे अंग परम सुन्दर और निर्दोष थे। दाँत तो और भी सुन्दर थे। वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके शरीरपर महीन साड़ी शोभा पा रही थी और कमलके