महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 484, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजा जनमेजय, आषाढ, वायुवेग, भूरितेजा, एकलव्य, सुमित्र, वाटधान, गोमुख, करूषदेशके अनेक राजा, क्षेमधूर्ति, श्रुतायु, उद्वह, बृहत्सेन, क्षेम, उग्रतीर्थ, कलिंग-नरेश कुहर तथा परम बुद्धिमान् मनुष्योंका राजा ईश्वर ।। ६०—६५ ।।
गणात् क्रोधवशादेष राजपूगोऽभवत् क्षितौ ।
जातः पुरा महाभागो महाकीर्तिर्महाबलः ।। ६६ ।।
इतने राजाओंका समुदाय पहले इस पृथ्वीपर क्रोधवश नामक दैत्यगणसे उत्पन्न हुआ था। ये सब राजा परम सौभाग्यशाली, महान् यशस्वी और अत्यन्त बलशाली थे ।। ६६ ।।
कालनेमिरिति ख्यातो दानवानां महाबलः ।
स कंस इति विख्यात उग्रसेनसुतो बली ।। ६७ ।।
दानवोंमें जो महाबली कालनेमि था, वही राजा उग्रसेनके पुत्र बलवान् कंसके नामसे विख्यात हुआ ।। ६७ ।।
यस्त्वासीद् देवको नाम देवराजसमद्युतिः ।
स गन्धर्वपतिर्मुख्यः क्षितौ जज्ञे नराधिपः ।। ६८ ।।
इन्द्रके समान कान्तिमान् राजा देवकके रूपमें इस पृथ्वीपर श्रेष्ठ गन्धर्वराज ही उत्पन्न हुआ था ।। ६८ ।।
बृहस्पतेर्बृहत्कीर्तेर्देवर्षेर्विद्धि भारत ।
अंशाद् द्रोणं समुत्पन्नं भारद्वाजमयोनिजम् ।। ६९ ।।
भारत! महान् कीर्तिशाली देवर्षि बृहस्पतिके अंशसे अयोनिज भरद्वाजनन्दन द्रोण उत्पन्न हुए, यह जान लो ।। ६९ ।।
धन्विनां नृपशार्दूल यः सर्वास्त्रविदुत्तमः ।
महाकीर्तिर्महातेजाः स जज्ञे मनुजेश्वर ।। ७० ।।
नृपश्रेष्ठ राजा जनमेजय! आचार्य द्रोण समस्त धनुर्धर वीरोंमें उत्तम और सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता थे। उनकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई थी। वे महान् तेजस्वी थे ।। ७० ।।
धनुर्वेदे च वेदे च यं तं वेदविदो विदुः ।
वरिष्ठं चित्रकर्माणं द्रोणं स्वकुलवर्धनम् ।। ७१ ।।
वेदवेत्ता विद्वान् द्रोणको धनुर्वेद और वेद दोनोंमें सर्वश्रेष्ठ मानते थे। वे विचित्र कर्म करनेवाले तथा अपने कुलकी मर्यादाको बढ़ानेवाले थे ।। ७१ ।।
महादेवान्तकाभ्यां च कामात् क्रोधाच्च भारत ।
एकत्वमुपपन्नानां जज्ञे शूरः परंतपः ।। ७२ ।।
अश्वत्थामा महावीर्यः शत्रुपक्षभयावहः ।
वीरः कमलपत्राक्षः क्षितावासीन्नराधिप ।। ७३ ।।
भारत! उनके यहाँ महादेव, यम, काम और क्रोधके सम्मिलित अंशसे शत्रुसंतापी शूरवीर अश्वत्थामाका जन्म हुआ, जो इस पृथ्वीपर महापराक्रमी और शत्रुपक्षका संहार