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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 457

जो अपने हाथोंमें चक्र और गदा धारण करते हैं, पीताम्बर पहनते हैं, जिनके अंगोंकी कान्ति श्याम रंगकी है, जिनकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव हुआ है, जो देव-शत्रुओंके नाशक तथा विशाल और मनोहर नेत्रोंसे युक्त हैं ॥ ५२ ॥

प्रजापतिपतिर्देवः सुरनाथो महाबलः ।
श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥ ५३ ॥
जो प्रजापतियोंके भी पति, दिव्यस्वरूप, देवताओंके रक्षक, महाबली, श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित, इन्द्रियोंके अधिष्ठाता तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित हैं ॥ ५३ ॥

तं भुवः शोधनायेन्द्र उवाच पुरुषोत्तमम् ।
अंशेनावतरेत्येवं तथेत्याह च तं हरिः ॥ ५४ ॥
उन भगवान् पुरुषोत्तमके पास जाकर इन्द्रने उनसे कहा—‘प्रभो! आप पृथ्वीका शोधन (भार-हरण) करनेके लिये अपने अंशसे अवतार ग्रहण करें।’ तब श्रीहरिने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥


* ‘वैश्यायां क्षत्रियाज्जातः करणः परिकीर्तितः ।’ (वैश्य माता और क्षत्रिय पितासे उत्पन्न पुत्र ‘करण’ कहलाता है) इस धर्मशास्त्रीय वचनके अनुसार युयुत्सुकी ‘करण’ संज्ञा बतायी गयी है।

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