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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 299

शेष उवाच

यथाह देवो वरदः प्रजापति-
र्महीपतिर्भूतपतिर्जगत्पतिः ।
तथा महीं धारयितास्मि निश्चलां
प्रयच्छतां मे शिरसि प्रजापते ॥ २० ॥

**शेषनागने कहा—**प्रजापते! आप वरदायक देवता, समस्त प्रजाके पालक, पृथ्वीके रक्षक, भूत-प्राणियोंके स्वामी और सम्पूर्ण जगत्के अधिपति हैं। आप जैसी आज्ञा देते हैं, उसके अनुसार मैं इस पृथ्वीको इस तरह धारण करूँगा, जिससे यह हिले-डुले नहीं। आप इसे मेरे सिरपर रख दें ॥ २० ॥

ब्रह्मोवाच

अधो महीं गच्छ भुजङ्गोत्तम
स्वयं तवैषा विवरं प्रदास्यति ।
इमां धरां धारयता त्वया हि मे
महत् प्रियं शेष कृतं भविष्यति ॥ २१ ॥

**ब्रह्माजीने कहा—**नागराज शेष! तुम पृथ्वीके नीचे चले जाओ। यह स्वयं तुम्हें वहाँ जानेके लिये मार्ग दे देगी। इस पृथ्वीको धारण कर लेनेपर तुम्हारे द्वारा मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायगा ॥ २१ ॥

सौतिरुवाच

तथैव कृत्वा विवरं प्रविश्य स
प्रभुर्भुवो भुजगवराग्रजः स्थितः ।
बिभर्ति देवीं शिरसा महीमिमां
समुद्रनेमिं परिगृह्य सर्वतः ॥ २२ ॥

**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**नागराज वासुकिके बड़े भाई सर्वसमर्थ भगवान् शेषने ‘बहुत अच्छा’ कहकर ब्रह्माजीकी आज्ञा शिरोधार्य की और पृथ्वीके विवरमें प्रवेश करके समुद्रसे घिरी हुई इस वसुधा-देवीको उन्होंने सब ओरसे पकड़कर सिरपर धारण कर लिया (तभीसे यह पृथ्वी स्थिर हो गयी) ॥ २२ ॥

ब्रह्मोवाच

शेषोऽसि नागोत्तम धर्मदेवो
महीमिमां धारयसे यदेकः ।
अनन्तभोगैः परिगृह्य सर्वां
यथाहमेवं बलभिद् यथा वा ॥ २३ ॥