सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 2245, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2245

पाण्डवानां प्रियरतस्तस्मान्मां भयमाविशत् ।। ४४ ।।
'धृष्टद्युम्न तो सम्बन्धकी दृष्टिसे कुन्तीपुत्रोंका साला ही है, अतः सदा उनका प्रिय करनेमें लगा रहता है, उसीसे मुझे भय है' ।। ४४ ।।
ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान् कवची शरी ।
मर्त्यधर्मतया तस्मादद्य मे साध्वसो महान् ।। ४५ ।।
'उसके शरीरकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान उद्भासित होती है। वह देवताका दिया हुआ पुत्र है और धनुष, बाण तथा कवचके साथ प्रकट हुआ है। मरणधर्मा मनुष्य होनेके कारण मुझे अब उससे महान् भय लगता है ।। ४५ ।।
गतो हि पक्षतां तेषां पार्षतः परवीरहा ।
रथातिरथसंख्यायां योऽग्रणीरर्जुनो युवा ।। ४६ ।।
सृष्टप्राणो भृशतरं तेन चेत् संगमो मम ।
किमन्यद् दुःखमधिकं परमं भुवि कौरवाः ।। ४७ ।।
'शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न पाण्डवोंके पक्षका पोषक हो गया है। रथियों और अतिरथियोंकी गणनामें जिसका नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह तरुण वीर अर्जुन धृष्टद्युम्नके लिये, यदि मेरे साथ उसका युद्ध हुआ तो, लड़कर प्राणतक देनेके लिये उद्यत हो जायगा। कौरवो! (अर्जुनके साथ मुझे लड़ना पड़े) इस पृथ्वीपर इससे बढ़कर महान् दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है? ।। ४६-४७ ।।
धृष्टद्युम्नो द्रोणमृत्युरीति विप्रथितं वचः ।
मद्वधाय श्रुतोऽप्येष लोके चाप्यतिविश्रुतः ।। ४८ ।।
'धृष्टद्युम्न द्रोणकी मौत है, यह बात सर्वत्र फैल चुकी है। मेरे वधके लिये ही उसका जन्म हुआ है। यह भी सब लोगोंने सुन रखा है। धृष्टद्युम्न स्वयं भी संसारमें अपनी वीरताके लिये विख्यात है ।। ४८ ।।
सोऽयं नूनमनुप्राप्तस्त्वत्कृते काल उत्तमः ।
त्वरितं कुरुत श्रेयो नैतदेतावता कृतम् ।। ४९ ।।
'तुम्हारे लिये यह निश्चय ही बहुत उत्तम अवसर प्राप्त हुआ है। शीघ्र ही अपने कल्याण-साधनमें लग जाओ। पाण्डवोंको वनवास दे देनेमात्रसे तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध नहीं हो सकता ।। ४९ ।।
मुहूर्तं सुखमेवैतत् तालच्छायेव हैमनी ।
यजध्वं च महायज्ञैर्भोगानश्नीत दत्त च ।। ५० ।।
इतश्चतुर्दशे वर्षे महत् प्राप्स्यथ वैशसम् ।