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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2231

(ततः सम्प्रस्थिते तत्र धर्मराजे तदा नृपे ।
जनाः समस्तास्तं द्रष्टुं समारुरुहुरातुराः ।।
ततः प्रासादवर्याणि विमानशिखराणि च ।
गोपुराणि च सर्वाणि वृक्षानन्यांश्च सर्वशः ।।
अधिरुह्य जनः श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत् ।
तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिर जब वनकी ओर प्रस्थित हुए, तब उस नगरके समस्त निवासी दुःखसे आतुर हो उन्हें देखनेके लिये महलों, मकानकी छतों, समस्त गोपुरों और वृक्षोंपर चढ़ गये। वहाँसे सब लोग उदास होकर उन्हें देखने लगे।
न हि रथ्यास्ततः शक्या गन्तुं बहुजनाकुलाः ।।
आरुह्य ते स्म तान्यत्र दीनाः पश्यन्ति पाण्डवम् ।
उस समय सड़कें मनुष्योंकी भारी भीड़से इतनी भर गयी थीं कि उनपर चलना असम्भव हो गया था। इसीलिये लोग ऊँचे चढ़कर अत्यन्त दीनभावसे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको देख रहे थे ।।
पदातिं वर्जितच्छत्रं चेलभूषणवर्जितम् ।।
वल्कलाजिनसंवीतं पार्थं दृष्ट्वा जनास्तदा ।
ऊचुर्बहुविधा वाचो भृशोपहतचेतसः ।।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर छत्ररहित एवं पैदल ही चल रहे थे। उनके शरीरपर राजोचित वस्त्रों और आभूषणोंका भी अभाव था। वे वल्कल और मृगचर्म पहने हुए थे। उन्हें इस