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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 2186, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 2186

जब यह शरीर प्राणरहित होकर शून्य एवं अपवित्र हो जाता है तथा समस्त बन्धु-बान्धव उसे त्याग देते हैं, तब ये ही ज्ञान आदि तीनों ज्योतियाँ (परलोकगत) पुरुषके उपयोगमें आती हैं ।। ६ ।।

तन्नो ज्योतिरभिहतं दाराणामभिमर्शनात् ।
धनंजय कथंस्वित् स्यादपत्यमभिमृष्टजम् ।। ७ ।।
धनंजय! हमारी धर्मपत्नी द्रौपदीके शरीरका बल-पूर्वक स्पर्श करके दुःशासनने उसे अपवित्र कर दिया है, इससे हमारी सन्तानरूप ज्योति नष्ट हो गयी। जो पराये पुरुषसे छू गयी, उस स्त्रीसे उत्पन्न संतान किस कामकी होगी? ।। ७ ।।

अर्जुन उवाच
न चैवोक्ता न चानुक्ता हीनतः परुषा गिरः ।
भारत प्रतिजल्पन्ति सदा त्तुत्तमपूरुषाः ।। ८ ।।
**अर्जुन बोले—**भारत! (द्रौपदी सती है। उसके विषयमें आप ऐसी बात न कहें। दुःशासनने अवश्य नीचता की है, किंतु) श्रेष्ठ पुरुष नीच पुरुषोंद्वारा कही या न कही गयी कड़वी बातोंका कभी उत्तर नहीं देते ।। ८ ।।

स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि ।
सन्तः प्रतिविजानन्तो लब्धसम्भावनाः स्वयम् ।। ९ ।।
प्रतिशोधका उपाय जानते हुए भी सत्पुरुष दूसरोंके उपकारोंको ही याद रखते हैं, उनके द्वारा किये हुए वैरको नहीं। उन साधु पुरुषोंको स्वयं सबसे सम्मान प्राप्त होता रहता है ।। ९ ।।

भीम उवाच
इहैवैतांस्त्वहं सर्वान् हन्मि शत्रून् समागतान् ।
अथ निष्क्रम्य राजेन्द्र समूलान् हन्मि भारत ।। १० ।।
**भीमसेनने (राजा युधिष्ठिरसे) कहा—**भरतवंशी राजराजेश्वर! (यदि आपकी आज्ञा हो, तो) यहाँ आये हुए इन सब शत्रुओंको मैं यहीं समाप्त कर दूँ और यहाँसे बाहर निकलकर इनके मूलका भी नाश कर डालूँ ।। १० ।।

किं नो विवदितेनेह किमुक्तेन च भारत ।
अद्यैवैतान् निहन्मीह प्रशाधि पृथिवीमिमाम् ।। ११ ।।
भारत! अब यहाँ विवाद या उत्तर-प्रत्युत्तर करनेकी हमें क्या आवश्यकता है? मैं आज ही इन सबको यमलोक भेज देता हूँ, आप इस सारी पृथ्वीका शासन कीजिये ।।

इत्युक्त्वा भीमसेनस्तु कनिष्ठैर्भ्रातृभिः सह ।
मृगमध्ये यथा सिंहो मुहुर्मुहुरुदैक्षत ।। १२ ।।