महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजाओ! विकर्णने अपनी बुद्धिके अनुसार इस प्रश्नका उत्तर दिया है, अब आपलोग भी अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार उस प्रश्नका निर्णय करें ॥ ६२ ॥
यो हि प्रश्नं न विब्रूयाद् धर्मदर्शी सभां गतः ।
अनृते या फलावाप्तिस्तस्याः सोऽर्धं समश्नुते ॥ ६३ ॥
जो धर्मज्ञ पुरुष सभामें जाकर वहाँ उपस्थित हुए प्रश्नका उत्तर नहीं देता, वह झूठ बोलनेके आधे फलका भागी होता है ॥ ६३ ॥
यः पुनर्वितथं ब्रूयाद् धर्मदर्शी सभां गतः ।
अनृतस्य फलं कृत्स्नं सम्प्राप्नोतीति निश्चयः ॥ ६४ ॥
इसी प्रकार जो धर्मज्ञ मानव सभामें जाकर किसी प्रश्नपर झूठा निर्णय देता है, वह निश्चय ही असत्यभाषण-का पूरा फल (दण्ड) पाता है ॥ ६४ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराङ्गिरसस्य च ॥ ६५ ॥
इस विषयमें विज्ञपुरुष प्रह्लाद और अंगिराकुमार मुनि सुधन्वाके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ६५ ॥
प्रह्लादो नाम दैत्येन्द्रस्तस्य पुत्रो विरोचनः ।
कन्याहेतोराङ्गिरसं सुधन्वानमुपाद्रवत् ॥ ६६ ॥
दैत्यराज प्रह्लादके एक पुत्र था विरोचन। उसका केशिनी नामवाली एक कन्याकी प्राप्तिके लिये अंगिराके पुत्र सुधन्वाके साथ विवाद हो गया ॥ ६६ ॥
अहं ज्यायानहं ज्यायानिति कन्येप्सया तदा ।
तयोर्देवनमत्रासीत् प्राणयोरिति नः श्रुतम् ॥ ६७ ॥
दोनों ही उस कन्याको पानेकी इच्छासे 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा कहने लगे। मेरे सुननेमें आया है कि उन दोनोंने अपनी बात सत्य करनेके लिये प्राणोंकी बाजी लगा दी ॥ ६७ ॥
तयोः प्रश्नविवादोऽभूत् प्रह्लादं तावपृच्छताम् ।
ज्यायान् क आवयोरेकः प्रश्नं प्रब्रूहि मा मृषा ॥ ६८ ॥
श्रेष्ठताके प्रश्नको लेकर जब उनका विवाद बहुत बढ़ गया, तब उन्होंने दैत्यराज प्रह्लादसे जाकर पूछा—'हम दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? आप इस प्रश्नका ठीक-ठीक उत्तर दीजिये, झूठ न बोलियेगा' ॥ ६८ ॥
स वै विवदनाद् भीतः सुधन्वानं विलोकयन् ।
तं सुधन्वाब्रवीत् क्रुद्धो ब्रह्मदण्ड इव ज्वलन् ॥ ६९ ॥
प्रह्लाद उस विवादसे भयभीत हो सुधन्वाकी ओर देखने लगे, तब सुधन्वाने प्रज्वलित ब्रह्मदण्डके समान कुपित होकर कहा— ॥ ६९ ॥
यदि वै वक्ष्यसि मृषा प्रह्लादाथ न वक्ष्यसि ।
शतधा ते शिरो वज्री वज्रेण प्रहरिष्यति ॥ ७० ॥