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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2155

‘नरश्रेष्ठ भूपालो! राजाओंके चार दुर्व्यसन बताये गये हैं—शिकार, मदिरापान, जूआ तथा विषयभोगमें अत्यन्त आसक्ति॥ २०॥

एतेषु हि नरः सक्तो धर्ममुत्सृज्य वर्तते।
यथायुक्तेन च कृतां क्रियां लोको न मन्यते॥ २१॥
‘इन दुर्व्यसनोंमें आसक्त मनुष्य धर्मकी अवहेलना करके मनमाना बर्ताव करने लगता है। इस प्रकार व्यसनासक्त पुरुषके द्वारा किये हुए किसी भी कार्यको लोग सम्मान नहीं देते हैं॥ २१॥

तदयं पाण्डुपुत्रेण व्यसने वर्तता भृशम्।
समाहूतेन कितवैरास्थितो द्रौपदीपणः॥ २२॥
‘ये पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर द्यूतरूपी दुर्व्यसनमें अत्यन्त आसक्त हैं। इन्होंने धूर्त जुआरियोंसे प्रेरित होकर द्रौपदीको दाँवपर लगा दिया है॥ २२॥

साधारणी च सर्वेषां पाण्डवानामनिन्दिता।
जितेन पूर्वं चानेन पाण्डवेन कृतः पणः॥ २३॥
‘सती-साध्वी द्रौपदी समस्त पाण्डवोंकी समानरूपसे पत्नी है, केवल युधिष्ठिरकी ही नहीं है। इसके सिवा, पाण्डुकुमार युधिष्ठिर पहले अपने-आपको हार चुके थे, उसके बाद उन्होंने द्रौपदीको दाँवपर रखा है॥ २३॥

इयं च कीर्तिता कृष्णा सौबलेन पणार्थिना।
एतत् सर्वं विचार्याहं मन्ये न विजितामिमाम्॥ २४॥
‘सब दाँवोंको जीतनेकी इच्छावाले सुबलपुत्र शकुनिने ही द्रौपदीको दाँवपर लगानेकी बात उठायी है। इन सब बातोंपर विचार करके मैं द्रुपदकुमारी कृष्णाको जीती हुई नहीं मानता’॥ २४॥

एतच्छ्रुत्वा महान् नादः सभ्यानामुदतिष्ठत।
विकर्णं शंसमानानां सौबलं चापि निन्दताम्॥ २५॥
यह सुनकर सभी सभासद विकर्णकी प्रशंसा और सुबलपुत्र शकुनिकी निन्दा करने लगे। उस समय वहाँ बड़ा कोलाहल मच गया॥ २५॥

तस्मिन्नुपरते शब्दे राधेयः क्रोधमूर्च्छितः।
प्रगृह्य रुचिरं बाहुमिदं वचनमब्रवीत्॥ २६॥
उस कोलाहलके शान्त होनेपर राधानन्दन कर्ण क्रोधसे मूर्च्छित हो उसकी सुन्दर बाँह पकड़कर इस प्रकार बोला॥

कर्ण उवाच

दृश्यन्ते वै विकर्णेह वैकृतानि बहून्यपि।
तज्जातस्तद्विनाशाय यथाग्निररणिप्रजः॥ २७॥