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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2056

अन्नदान करनेपर वह शंख अपने-आप बज उठता था। उस समय उस शंखने बड़े
जोरसे अपनी ध्वनिका विस्तार किया। उसके गम्भीर नादसे समस्त भूमिपाल तेजोहीन
होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।

धृष्टद्युम्नः पाण्डवाश्च सात्यकिः केशवोऽष्टमः ।
सत्त्वस्थाः शौर्यसम्पन्ना अन्योन्यप्रियकारिणः ॥
केवल धृष्टद्युम्न, पाँच पाण्डव, सात्यकि तथा आठवें श्रीकृष्ण धैर्यपूर्वक खड़े रहे। ये
सब-के-सब एक-दूसरेका प्रिय करनेवाले तथा शौर्यसे सम्पन्न हैं।

विसंज्ञान् भूमिपान् दृष्ट्वा मां च ते प्राहसंस्तदा ॥
ततः प्रहृष्टो बीभत्सुरददाद्धेमशृङ्खिणः ।
शतान्यनडुहां पञ्च द्विजमुख्याय भारत ॥
इन्होंने मुझको तथा दूसरे भूमिपालोंको मूर्च्छित हुआ देख जोर-जोरसे हँसना आरम्भ
किया। उस समय अर्जुनने अत्यन्त प्रसन्न होकर एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको पाँच सौ हृष्ट-पुष्ट बैल
दिये। वे बैल गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ थे और उनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया था।

सुमुखेन बलिर्मुख्यः प्रेषितोऽजातशत्रवे ।
कुणिन्देन हिरण्यं च वासांसि विविधानि च ॥
भारत! राजा सुमुखने अजातशत्रु युधिष्ठिरके पास भेंटकी प्रमुख वस्तुएँ भेजी थीं।
कुणिन्दने भाँति-भाँतिके वस्त्र और सुवर्ण दिये थे।

काश्मीरराजो मार्द्वीकं शुद्धं च रसवन्मधु ।
बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवायाभ्युपाहरत् ॥
काश्मीरनरेशने मीठे तथा रसीले शुद्ध अंगूरोंके गुच्छे भेंट किये थे। साथ ही सब
प्रकारकी उपहार-सामग्री लेकर उन्होंने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित की थी।

यवना ह्यानुपादाय पर्वतीयान् मनोजवान् ।
आसनानि महार्हाणि कम्बलांश्च महाधनान् ॥
नवान् विचित्रान् सूक्ष्मांश्च पराग्र्यान् सुप्रदर्शनान् ।
अन्यच्च विविधं रत्नं द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥
कितने ही यवन मनके समान वेगशाली पर्वतीय घोड़े, बहुमूल्य आसन, नूतन, सूक्ष्म,
विचित्र दर्शनीय और कीमती कम्बल, भाँति-भाँतिके रत्न तथा अन्य वस्तुएँ लेकर
राजद्वारपर खड़े थे, फिर भी अंदर नहीं जाने पाते थे।

श्रुतायुरपि कालिङ्गो मणिरत्नमनुत्तमम् ।
कलिंगनरेश श्रुतायुने उत्तम मणिरत्न भेंट किये।

दक्षिणात् सागराभ्याशात् प्रावारांश्च परःशतान् ॥
औदकानि सरत्नानि बलिं चादाय भारत ।
अन्येभ्यो भूमिपालेभ्यः पाण्डवाय न्यवेदयत् ॥