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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 2046, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 2046

'फिर सब देशोंसे बढ़ई बुलाकर उस सभाभवनके खंभों और दीवारोंमें रत्न जड़वा दिये जायँ। इस प्रकार वह सुन्दर एवं सुसज्जित सभाभवन जब सुखपूर्वक प्रवेशके योग्य हो जाय, तब धीरे-से मेरे पास आकर इसकी सूचना दो' ॥ ४९ ॥
दुर्योधनस्य शान्त्यर्थमिति निश्चित्य भूमिपः ।
धृतराष्ट्रो महाराज प्राहिणोद् विदुराय वै ॥ ५० ॥
महाराज! दुर्योधनकी शान्तिके लिये ऐसा निश्चय करके राजा धृतराष्ट्रने विदुरके पास दूत भेजा ॥ ५० ॥
अपृष्ट्वा विदुरं स्वस्य नासीत् कश्चिद् विनिश्चयः ।
द्यूते दोषांश्च जानन् स पुत्रस्नेहादकृष्यत ॥ ५१ ॥
विदुरसे पूछे बिना उनका कोई भी निश्चय नहीं होता था। जूएके दोषोंको जानते हुए भी वे पुत्रस्नेहसे उसकी ओर आकृष्ट हो गये थे ॥ ५१ ॥
तच्छ्रुत्वा विदुरो धीमान् कलिद्वारमुपस्थितम् ।
विनाशमुखमुत्पन्नं धृतराष्ट्रमुपाद्रवत् ॥ ५२ ॥
बुद्धिमान् विदुर कलहके द्वाररूप जूएका अवसर उपस्थित हुआ सुनकर और विनाशका मुख प्रकट हुआ जान धृतराष्ट्रके पास दौड़े आये ॥ ५२ ॥
सोऽभिगम्य महात्मानं भ्राता भ्रातरमग्रजम् ।
मूर्ध्ना प्रणम्य चरणाविदं वचनमब्रवीत् ॥ ५३ ॥
विदुरने अपने श्रेष्ठ भ्राता महामना धृतराष्ट्रके पास जाकर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा ॥ ५३ ॥

विदुर उवाच

नाभिनन्दामि ते राजन् व्यवसायमिमं प्रभो ।
पुत्रैर्भेदो यथा न स्याद् द्यूतहेतोस्तथा कुरु ॥ ५४ ॥
**विदुर बोले—**राजन्! मैं आपके इस निश्चयको पसंद नहीं करता। प्रभो! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे जूएके लिये आपके और पाण्डुके पुत्रोंमें भेदभाव न हो ॥ ५४ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

क्षत्तः पुत्रेषु पुत्रैर्मे कलहो न भविष्यति ।
यदि देवाः प्रसादं नः करिष्यन्ति न संशयः ॥ ५५ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**विदुर! यदि हमलोगोंपर देवताओंकी कृपा होगी तो मेरे पुत्रोंका पाण्डुपुत्रोंके साथ निःसंदेह कलह न होगा ॥ ५५ ॥
अशुभं वा शुभं वापि हितं वा यदि वाहितम् ।
प्रवर्त्ततां सुहृद्द्यूतं दिष्टमेतन्न संशयः ॥ ५६ ॥