महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1964, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथाक्षतमहावृष्ट्या लाजपुष्पघृतैरपि ।।
वृष्णयोऽवाकिरन् प्रीताः संकर्षणजनार्दनौ ।
तत्पश्चात् वृष्णिवंशी पुरुषोंने प्रसन्न होकर बलराम और श्रीकृष्णपर लाजा (खील), फूल और घीसे युक्त अक्षतकी वर्षा की।
सबालाः सहवृद्धाश्च सजातिकुलबान्धवाः ।।
उपोपविविशुः प्रीता वृष्णयो मधुसूदनम् ।
उस समय बालक, वृद्ध, ज्ञाति, कुल और बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त वृष्णिवंशी प्रसन्नतापूर्वक भगवान् मधुसूदनके समीप बैठ गये।
पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः ।।
विवेश पुरुषव्याघ्रः स्ववेश्म मधुसूदनः ।
इसके बाद पुरवासियोंकी प्रीति बढ़ानेवाले पुरुषसिंह महाबाहु मधुसूदनने सबसे पूजित हो अपने महलमें प्रवेश किया।
रुक्मिण्या सहितो देव्या प्रमुमोद सुखी सुखम् ।
अनन्तरं च सत्याया जाम्बवत्याश्च भारत ।
सर्वासां च यदुश्रेष्ठः सर्वकालविहारवान् ।।
वहाँ सदा प्रसन्न रहनेवाले श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके साथ बड़े सुखका अनुभव करने लगे। भारत! तत्पश्चात् सदा लीला-विहार करनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण क्रमशः सत्यभामा तथा जाम्बवती आदि सभी देवियोंके निवास-स्थानोंमें गये।
जगाम च हृषीकेशो रुक्मिण्याः स्वं निवेशनम् ।
फिर अन्तमें श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके महलमें पधारे।
एष तात महाबाहो विजयः शार्ङ्गधन्वनः ।।
एतदर्थं च जन्माहुर्मानुषेषु महात्मनः ।
तात! महाबाहु युधिष्ठिर! शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी यह विजयगाथा कही गयी है। इसीके लिये महात्मा श्रीकृष्णका मनुष्योंमें अवतार हुआ बताया जाता है।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)