महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1466, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रः स्थाणुश्च भगवान् धैर्येण प्रत्यवस्थितौ ॥ २४ ॥
वहाँ तिलोत्तमाने जब देवमण्डलीकी प्रदक्षिणा आरम्भ की, तब इन्द्र और भगवान् शंकर दोनों धैर्यपूर्वक अपने स्थानपर ही बैठे रहे ॥ २४ ॥
द्रष्टुकामस्य चात्यर्थं गतया पार्श्वतस्तया ।
अन्यदञ्चितपद्माक्षं दक्षिणं निःसृतं मुखम् ॥ २५ ॥
जब वह दक्षिण पार्श्वकी ओर गयी, तब उसे देखनेकी इच्छासे भगवान् शंकरके दक्षिणभागमें एक और मुख प्रकट हो गया, जो कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित था ॥ २५ ॥
पृष्ठतः परिवर्तन्त्या पश्चिमं निःसृतं मुखम् ।
गतया चोत्तरं पार्श्वमुत्तरं निःसृतं मुखम् ॥ २६ ॥
जब वह पीछेकी ओर गयी, तब उनका पश्चिम मुख प्रकट हुआ और उत्तर पार्श्वकी ओर उसके जानेपर भगवान् शिवके उत्तरवर्ती मुखका प्राकट्य हुआ ॥ २६ ॥
महेन्द्रस्यापि नेत्राणां पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः ।
रक्तान्तानां विशालानां सहस्रं सर्वतोऽभवत् ॥ २७ ॥
इसी प्रकार इन्द्रके भी आगे, पीछे और पार्श्व-भागमें सब ओर लाल कोनेवाले सहस्रों विशाल नेत्र प्रकट हो गये ॥ २७ ॥
एवं चतुर्मुखः स्थाणुर्महादेवोऽभवत् पुरा ।
तथा सहस्रनेत्रश्च बभूव बलसूदनः ॥ २८ ॥
इस प्रकार पूर्वकालमें अविनाशी भगवान् महादेवजीके चार मुख प्रकट हुए और बलहन्ता इन्द्रके हजार नेत्र हुए ॥ २८ ॥
तथा देवनिकायानां महर्षीणां च सर्वशः ।
मुखानि चाभ्यवर्तन्त येन याति तिलोत्तमा ॥ २९ ॥
दूसरे-दूसरे देवताओं और महर्षियोंके मुख भी जिस ओर तिलोत्तमा जाती थी, उसी ओर घूम जाते थे ॥ २९ ॥
तस्या गात्रे निपतिता दृष्टिस्तेषां महात्मनाम् ।
सर्वेषामेव भूयिष्ठमृते देवं पितामहम् ॥ ३० ॥
उस समय देवाधिदेव ब्रह्माजीको छोड़कर शेष सभी महानुभावोंकी दृष्टि तिलोत्तमाके शरीरपर बार-बार पड़ने लगी ॥ ३० ॥
गच्छन्त्या तु तया सर्वे देवाश्च परमर्षयः ।
कृतमित्येव तत् कार्यं मेनिरे रूपसम्पदा ॥ ३१ ॥
जब वह जाने लगी, तब सभी देवताओं और महर्षियोंको उसकी रूपसम्पत्ति देखकर यह विश्वास हो गया कि अब वह सारा कार्य सिद्ध ही है ॥ ३१ ॥