महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1454, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीक्षां कृत्वा गतौ विन्ध्यं तावुग्रं तेपतुस्तपः ॥ ७ ॥
किसी समय वे तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छासे एकमत होकर गुरुसे दीक्षा ले विन्ध्य पर्वतपर आये और वहाँ कठोर तपस्या करने लगे ॥ ७ ॥
तौ तु दीर्घेण कालेन तपोयुक्तौ बभूवतुः ।
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ जटावल्कलधारिणौ ॥ ८ ॥
भूख और प्यासका कष्ट सहते हुए सिरपर जटा तथा शरीरपर वल्कल धारण किये वे दोनों भाई दीर्घकालतक भारी तपस्यामें लगे रहे ॥ ८ ॥
मलोपचितसर्वाङ्गौ वायुभक्षौ बभूवतुः ।
आत्ममांसानि जुह्वन्तौ पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितौ ।
ऊर्ध्वबाहू चानिमिषौ दीर्घकालं धृतव्रतौ ॥ ९ ॥
उनके सम्पूर्ण अंगोंमें मैल जम गयी थी, वे हवा पीकर रहते थे और अपने ही शरीरके मांसखण्ड काट-काटकर अग्निमें आहुति देते थे। तदनन्तर बहुत समयतक पैरोंके अंगूठोंके अग्रभागके बलपर खड़े हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये एकटक दृष्टिसे देखते हुए वे दोनों व्रत धारण करके तपस्यामें संलग्न रहे ॥ ९ ॥
तयोस्तपःप्रभावेण दीर्घकालं प्रतापितः ।
धूमं प्रमुमुचे विन्ध्यस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १० ॥
उन दैत्योंकी तपस्याके प्रभावसे दीर्घकालतक संतप्त होनेके कारण विन्ध्य पर्वत धुआँ छोड़ने लगा, यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ १० ॥
ततो देवा भयं जग्मुरुग्रं दृष्ट्वा तयोस्तपः ।
तपोविघातार्थमथो देवा विघ्नानि चक्रिरे ॥ ११ ॥
उनकी उग्र तपस्या देखकर देवताओंको बड़ा भय हुआ। वे देवतागण उनके तपको भंग करनेके लिये अनेक प्रकारके विघ्न डालने लगे ॥ ११ ॥
रत्नैः प्रलोभयामासुः स्त्रीभिश्चोभौ पुनः पुनः ।
न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥ १२ ॥
उन्होंने बार-बार रत्नोंके ढेर तथा सुन्दरी स्त्रियोंको भेज-भेजकर उन दोनोंको प्रलोभनमें डालनेकी चेष्टा की; किंतु उन महान् व्रतधारी दैत्योंने अपने तपको भंग नहीं किया ॥ १२ ॥
अथ मायां पुनर्देवास्तयोश्चक्रुर्महात्मनोः ।
भगिन्यो मातरो भार्यास्तयोश्चात्मजनस्तथा ॥ १३ ॥
प्रपात्यमाना विस्रस्ताः शूलहस्तेन रक्षसा ।
भ्रष्टाभरणकेशान्ता भ्रष्टाभरणवाससः ॥ १४ ॥
अभिभाष्य ततः सर्वास्तौ त्राहीति विचुक्रुशुः ।
न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥ १५ ॥