महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1440, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसब प्रकारकी शिल्पकलाके जानकार मनुष्य भी उन दिनों इन्द्रप्रस्थमें निवास करनेके लिये आ गये थे। नगरके चारों ओर रमणीय उद्यान थे ॥ ४० ॥
आम्रैराम्रातकैर्नीपैरशोकैश्चम्पकैस्तथा ।
पुन्नागैर्नागपुष्पैश्च लकुचैः पनसैस्तथा ॥ ४१ ॥
शालतालतमालैश्च बकुलैश्च सकेतकैः ।
मनोहरैः सुपुष्पैश्च फलभारावनामितैः ॥ ४२ ॥
जो आम, आमड़ा, कदम्ब, अशोक, चम्पा, पुन्नाग, नागपुष्प, लकुच, कटहल, साल, ताल, तमाल, मौलसिरी और केवड़ा आदि सुन्दर फूलोंसे भरे और फलोंके भारसे झुके हुए मनोहर वृक्षोंसे सुशोभित थे ॥ ४१-४२ ॥
प्राचीनामलकैर्लोध्रैरङ्कोलैश्च सुपुष्पितैः ।
जम्बूभिः पाटलाभिश्च कुब्जकैरतिमुक्तकैः ॥ ४३ ॥
करवीरैः पारिजातैरन्यैश्च विविधैर्द्रुमैः ।
नित्यपुष्पफलोपेतैर्नानाद्विजगणायुतैः ॥ ४४ ॥
प्राचीन आँवले, लोध्र, खिले हुए अंकोल, जामुन, पाटल, कुब्जक, अतिमुक्तक लता, करवीर, पारिजात तथा अन्य नाना प्रकारके वृक्ष, जिनमें सदा फल और फूल लगे रहते थे और जिनके ऊपर भाँति-भाँतिके सहस्रों पक्षी कलरव करते थे, उन उद्यानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ४३-४४ ॥
मत्तबर्हिणसंघुष्टकोकिलैश्च सदामदैः ।
गृहैरादर्शविमलैर्विविधैश्च लतागृहैः ॥ ४५ ॥
मतवाले मयूरोंके केकारव तथा सदा उन्मत्त रहनेवाली कोकिलोंकी काकली वहाँ गूँजती रहती थी। उन उद्यानोंमें दर्पणके समान स्वच्छ क्रीड़ाभवन तथा नाना प्रकारके लतामण्डप बनाये गये थे ॥ ४५ ॥
मनोहरैश्चित्रगृहैस्तथाजगतिपर्वतैः ।
वापीभिर्विविधाभिश्च पूर्णाभिः परमाम्भसा ॥ ४६ ॥
सरोभिरतिरम्यैश्च पद्मोत्पलसुगन्धिभिः ।
हंसकारण्डवयुतैश्चक्रवाकोपशोभितैः ॥ ४७ ॥
मनोहर चित्रशालाओं तथा राजाओंकी विहारयात्राके लिये निर्मित हुए कृत्रिम पर्वतोंसे भी वे उद्यान बड़ी शोभा पा रहे थे। उत्तम जलसे भरी हुई अनेक प्रकारकी बावलियाँ तथा कमल और उत्पलकी सुगन्धसे वासित अत्यन्त रमणीय सरोवर जहाँ हंस, कारण्डव तथा चक्रवाक आदि पक्षी निवास करते थे, उन उद्यानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ४६-४७ ॥
रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो वनावृताः ।
तडागानि च रम्याणि बृहन्ति सुबहूनि च ॥ ४८ ॥