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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1279

नहीं है ॥ १४ ॥
शापाद्धि शक्तेर्वासिष्ठ तदा तदुपपादितम् ।
आत्मजेन स दोषेण शक्तिर्नींत इतो दिवम् ॥ १५ ॥
वसिष्ठकुलभूषण! शक्तिके शापसे ही उस समय वैसी दुर्घटना हो गयी थी। वे अपने ही अपराधसे इस लोकको छोड़कर स्वर्गवासी हुए हैं (इसमें राक्षसोंका कोई दोष नहीं है) ॥ १५ ॥
न हि तं राक्षसः कश्चिच्छक्तो भक्षयितुं मुने ।
आत्मनैवात्मनस्तेन दृष्टो मृत्युस्तदाभवत् ॥ १६ ॥
‘मुने! कोई भी राक्षस उन्हें खा नहीं सकता था। अपने ही शापसे (राजाको नरभक्षी राक्षस बना देनेके कारण) उन्हें उस समय अपनी मृत्यु देखनी पड़ी ॥ १६ ॥
निमित्तभूतस्तत्रासीद् विश्वामित्रः पराशर ।
राजा कल्माषपादश्च दिवमारुह्य मोदते ॥ १७ ॥
‘पराशर! विश्वामित्र तथा राजा कल्माषपाद भी इसमें निमित्तमात्र ही थे (तुम्हारे पूर्वजोंकी मृत्युमें तो प्रारब्ध ही प्रधान है)। इस समय तुम्हारे पिता शक्ति स्वर्गमें जाकर आनन्द भोगते हैं ॥ १७ ॥
ये च शक्त्यवराः पुत्रा वसिष्ठस्य महामुने ।
ते च सर्वे मुदा युक्ता मोदन्ते सहिताः सुरैः ॥ १८ ॥
‘महामुने! वसिष्ठजीके शक्तिसे छोटे जो पुत्र थे, वे सभी देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक सुख भोग रहे हैं ॥ १८ ॥
सर्वमेतद् वसिष्ठस्य विदितं वै महामुने ।
रक्षसां च समुच्छेद एष तात तपस्विनाम् ॥ १९ ॥
निमित्तभूतस्त्वं चात्र क्रतौ वासिष्ठनन्दन ।
तत् सत्रं मुञ्च भद्रं ते समाप्तमिदमस्तु ते ॥ २० ॥
‘महर्षे! तुम्हारे पितामह वसिष्ठजीको ये सब बातें विदित हैं। तात शक्तिनन्दन! तेजस्वी राक्षसोंके विनाशके लिये आयोजित इस यज्ञमें तुम भी निमित्तमात्र ही बने हो (वास्तवमें यह सब उन्हींके पूर्वकर्मोंका फल है)। अतः अब इस यज्ञको छोड़ दो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे इस सत्रकी समाप्ति हो जानी चाहिये' ॥ १९-२० ॥

गन्धर्व उवाच

एवमुक्तः पुलस्त्येन वसिष्ठेन च धीमता ।
तदा समापयामास सत्रं शाक्तो महामुनिः ॥ २१ ॥
**गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! पुलस्त्यजी तथा परम बुद्धिमान् वसिष्ठजीके यों कहनेपर महामुनि शक्तिपुत्र पराशरने उसी समय यज्ञको समाप्त कर दिया ॥ २१ ॥