सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1252, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1252

निवृत्तोऽन्तःपुरं पार्थ प्रविवेश महामनाः ॥ २७ ॥
पार्थ! तत्पश्चात् महामना राजा मित्रसह इच्छानुसार मौजसे घूम-फिरकर जब लौटे, तब अन्तःपुरमें चले गये ॥ २७ ॥

ततोऽर्धरात्र उत्थाय सूदमानाय्य सत्वरम् ।
उवाच राजा संस्मृत्य ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुतम् ॥ २८ ॥
गच्छामुष्मिन् वनोद्देशे ब्राह्मणो मां प्रतीक्षते ।
अन्नार्थी तं त्वमन्नेन समांसेनोपपादय ॥ २९ ॥
वहाँ आधी रातके समय उन्हें ब्राह्मणको भोजन देनेकी प्रतिज्ञाका स्मरण हुआ। फिर तो वे उठ बैठे और तुरंत रसोइयेको बुलाकर बोले—‘जाओ, वनके अमुक प्रदेशमें एक ब्राह्मण भोजनके लिये मेरी प्रतीक्षा करता है। उसे तुम मांसयुक्त भोजनसे तृप्त करो’ ॥ २८-२९ ॥

गन्धर्व उवाच

एवमुक्तस्ततः सूदः सोऽनासाद्यामिषं क्वचित् ।
निवेदयामास तदा तस्मै राज्ञे व्यथान्वितः ॥ ३० ॥
**गन्धर्व कहता है—**उनके यों कहनेपर रसोइयेने मांसके लिये खोज की; परंतु जब कहीं भी मांस नहीं मिला, तब उसने दुःखी होकर राजाको इस बातकी सूचना दी ॥ ३० ॥

राजा तु रक्षसाऽऽविष्टः सूदमाह गतव्यथः ।
अप्येनं नरमांसेन भोजयेति पुनः पुनः ॥ ३१ ॥
राजापर राक्षसका आवेश था, अतः उन्होंने रसोइयेसे निश्चिन्त होकर कहा—‘उस ब्राह्मणको मनुष्यका मांस ही खिला दो’ यह बात उन्होंने बार-बार दुहरायी ॥ ३१ ॥

तथेत्युक्त्वा ततः सूदः संस्थानं वध्यघातिनाम् ।
गत्वाऽऽजहार त्वरितो नरमांसमपेतभीः ॥ ३२ ॥
तब रसोइया ‘तथास्तु’ कहकर वध्यभूमिमें जल्लादोंके घर गया और (उनसे) निर्भय होकर तुरंत ही मनुष्यका मांस ले आया ॥ ३२ ॥

एतत् संस्कृत्य विधिवदन्नोपहितमाशु वै ।
तस्मै प्रादाद् ब्राह्मणाय क्षुधिताय तपस्विने ॥ ३३ ॥
फिर उसीको तुरंत विधिपूर्वक राँधकर अन्नके साथ उसे उस तपस्वी एवं भूखे ब्राह्मणको दे दिया ॥ ३३ ॥

स सिद्धचक्षुषा दृष्ट्वा तदन्नं द्विजसत्तमः ।
अभोज्यमिदमित्याह क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ३४ ॥
तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने तपःसिद्ध दृष्टिसे उस अन्नको देखा और ‘यह खानेयोग्य नहीं है’ यों समझकर क्रोधपूर्ण नेत्रोंसे देखते हुए कहा ॥ ३४ ॥