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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1151, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1151

देशकी रक्षा करता है। उसके कारण हमें शत्रुराज्यों तथा हिंसक प्राणियोंसे कभी भय नहीं
होता ।। ३—५ ।।
वेतनं तस्य विहितं शालिवाहस्य भोजनम् ।
महिषौ पुरुषश्चैको यस्तदादाय गच्छति ।। ६ ।।
उसके लिये कर नियत किया गया है—बीस खारी अगहनीके चावलका भात, दो भैंसे
और एक मनुष्य, जो वह सब सामान लेकर उसके पास जाता है ।। ६ ।।
एकैकश्चापि पुरुषस्तत् प्रयच्छति भोजनम् ।
स वारो बहुभिर्वर्षैर्भवत्यसुकरो नरैः ।। ७ ।।
प्रत्येक गृहस्थ अपनी बारी आनेपर उसे भोजन देता है। यद्यपि यह बारी बहुत वर्षोंके
बाद आती है, तथापि लोगोंके लिये उसकी पूर्ति बहुत कठिन होती है ।। ७ ।।
तद्विमोक्षाय ये केचिद् यतन्ति पुरुषाः क्वचित् ।
सपुत्रदारांस्तान् हत्वा तद् रक्षो भक्षयत्युत ।। ८ ।।
जो कोई पुरुष कभी उससे छूटनेका प्रयत्न करते हैं, वह राक्षस उन्हें पुत्र और
स्त्रीसहित मारकर खा जाता है ।। ८ ।।
वेत्रकीयगृहे राजा नायं नयमिहास्थितः ।
उपायं तं न कुरुते यत्नादपि स मन्दधीः ।
अनामयं जनस्यास्य येन स्यादद्य शाश्वतम् ।। ९ ।।
वास्तवमें जो यहाँका राजा है, वह वेत्रकीयगृह नामक स्थानमें रहता है। परंतु वह
न्यायके मार्गपर नहीं चलता। वह मन्दबुद्धि राजा यत्न करके भी ऐसा कोई उपाय नहीं
करता, जिससे सदाके लिये प्रजाका संकट दूर हो जाय ।। ९ ।।
एतदर्हा वयं नूनं वसामो दुर्बलस्य ये ।
विषये नित्यवास्तव्याः कुराजानमुपाश्रिताः ।। १० ।।
निश्चय ही हमलोग ऐसा ही दुःख भोगनेके योग्य हैं; क्योंकि इस दुर्बल राजाके राज्यमें
निवास करते हैं, यहाँके नित्य निवासी हो गये हैं और इस दुष्ट राजाके आश्रयमें रहते
हैं ।। १० ।।
ब्राह्मणाः कस्य वक्तव्याः कस्य वाच्छन्दचारिणः ।
गुणैरेते हि वत्स्यन्ति कामगाः पक्षिणो यथा ।। ११ ।।
ब्राह्मणोंको कौन आदेश दे सकता है अथवा वे किसके अधीन रह सकते हैं। ये तो
इच्छानुसार विचरनेवाले पक्षियोंकी भाँति देश या राजाके गुण देखकर ही कहीं भी निवास
करते हैं ।। ११ ।।
राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् ।
त्रयस्य संचयेनास्य ज्ञातीन् पुत्रांश्च तारयेत् ।। १२ ।।