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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1043

जिस पक्षमें ये दोनों होंगे, उसी ओर शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य भी रहेंगे। वे अपने बहनोई द्रोण और भानजे अश्वत्थामाको कभी छोड़ न सकेंगे ॥ २१ ॥

क्षत्तार्थबद्धस्त्वस्माकं प्रच्छन्नं संयतः परैः ।
न चैकः स समर्थोऽस्मान् पाण्डवार्थेऽधिबाधितुम् ॥ २२ ॥
विदुर भी हमारे आर्थिक बन्धनमें हैं, यद्यपि वे छिपे-छिपे हमारे शत्रुओंके स्नेहपाशमें बँधे हैं। परंतु वे अकेले पाण्डवोंके हितके लिये हमें बाधा पहुँचानेमें समर्थ न हो सकेंगे ॥ २२ ॥

स विस्रब्धः पाण्डुपुत्रान् सह मात्रा प्रवासय ।
वारणावतमद्यैव यथा यान्ति तथा कुरु ॥ २३ ॥
इसलिये आप पूर्ण निश्चिन्त होकर पाण्डवोंको उनकी माताके साथ वारणावत भेज दीजिये और ऐसी व्यवस्था कीजिये, जिससे वे आज ही चले जायँ ॥ २३ ॥

विनिद्रकरणं घोरं हृदि शल्यमिवार्पितम् ।
शोकपावकमुद्भूतं कर्मणैतेन नाशय ॥ २४ ॥
मेरे हृदयमें भयंकर काँटा-सा चुभ रहा है, जो मुझे नींद नहीं लेने देता। शोककी आग प्रज्वलित हो उठी है, आप (मेरे द्वारा प्रस्तावित) इस कार्यको पूरा करके मेरे हृदयकी शोकाग्निको बुझा दीजिये ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि दुर्योधनपरामर्शे
एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें दुर्योधनपरामर्शविषयक एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४१ ॥