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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 404 में से

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पृष्ठ 400

( ३८२ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
विश्वंभराके काटनेकी ठौर सरसोंके समान फुन्सियोंसें व्याप्त हो और शीत ज्वर-
करके रोगी व्याकुल होय ॥
अहिंडुकादष्टके लक्षण ।
अहिंडुकाभिर्दष्टे तोददाहकण्डूश्वयथुका मोहश्च ।
अहिंडुकाके काटनेकीसी पीडा, दाह, खुजली, सूजन, मोह होय ॥
कण्डूमकादष्टके लक्षण ।
कण्डूमकादिभिर्दष्टे पीतांगश्छर्द्यतीसारज्वरादिभिर्हन्यते ॥ १७ ॥
कण्डूमका कीडोंके काटनेसे देह पीली हो जाय, वमन, अतिसार और ज्वरादि-
रोगोंसे मनुष्य पीडित होय ॥
शूकवृन्तादिदष्टके लक्षण ।
शूकवृन्तादिभिर्दष्टे कण्डूकोठाः प्रवर्द्धन्ते शूकश्चात्र लक्ष्यते ।
शूकवृन्तादि कीडोंके काटनेसे खुजली, चकत्ता और शूकरोग हों ॥
पिपीलिकादंशलक्षण ।
पिपीलिका। स्थूलशीर्षा संवाहिका ब्राह्मणिकांगुलिका कपि-
लिका चित्रवर्णेति षट् । ताभिर्दष्टे दंशे श्वयथुरग्निस्पर्शविदा-
हशोफौ भवतः ॥ १८ ॥
स्थूलशीर्षा, संवाहिका, ब्राह्मणिका, अंगुलिका, कपिलिका, चित्रवर्णा ये छः
प्रकारकी पिपीलिका (चेंटी) हैं इनके काटनेकी जगह सूजन, अग्निस्पर्शके समान
दाह और चकत्ते और सूजन होवें ॥
स्नायुके निदान ।
शाखासु कुपितो दोषः शोथं कृत्वा विसर्पवत् । भिनत्ति तंक्षते
तत्र सोष्मा मांसं विशोष्य च ॥ १ ॥ कुर्यात्तन्तुनिभं जीवं
वृत्तं सितद्युतिं बहिः । शनैः शनैः क्षताद्याति च्छेदात्कोप-
मुपैति च ॥ २ ॥ तत्पाताच्छोफशान्तिः स्यात्पुनः स्थानां-
तरे भवेत् । स स्नायुकेति विख्यातः क्रियोक्ता तु विसर्पवत्
॥ ३ ॥ बाह्वोर्यदि प्रमादेन जंघयोस्तुद्यते क्वचित् । संकोचं
खंजतां चैव छिन्नो जन्तुः करोत्यसौ ॥ ४ ॥
हाथ पैरोंमें दोष कुपित होकर विसर्पके सदृश सूजन होय, वह सूजन फूट
कर घाव पडजावे और उसमें आभ्यंतरीय अग्नि, मांसके शुष्क करके सूतके
समान गोल सफेद जीव डोरके सदृश बाहर निकले वह जीव धीरे धीरे घावसे
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