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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 404 में से

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पृष्ठ 338

( ३२० ) माधव निदान ।
अक्षिपाकात्ययके लक्षण ।
श्वेतः समाक्रामति सर्वतो हि दोषेण यस्यासितमण्डलं तु ।
तमक्षिपाकात्ययमक्षिपाकं सर्वात्मकं वर्जयितव्यमाहुः ॥ २९ ॥
नेत्रके कृष्णभागमें दोषोंके योगसे चारों ओर सफेद ( शुक्र ) फैल जावे यह
सन्निपातजन्य अक्षिपाकात्ययनामक रोग त्याज्य है ऐसा कहा है ॥
अजकाजातके लक्षण ।
अजापुरीषप्रतिमो रुजावान् सलोहितो लोहितपिच्छलाश्रु ।
विगृह्य कृष्णं प्रचयोऽभ्युपैति तच्चाजकाजातमिति व्यवस्येत् ॥३०॥
काले भागमें बकरीके शुष्क विष्ठाके समान, दुखनेवाली, लाल हो और गाढा
कुछ कालेंसे आंसू वहे उसको अजकाजात ऐसे जानना चाहिये ॥ इतिकृष्णजरोग ॥
दृष्टिके रोग ।
पहले पटलमें दोष जानेसे उसके लक्षण ।
प्रथमे पटले यस्य दोषो दृष्टिं व्यवस्थितः ।
अव्यक्तानि च रूपाणि कदाचिदथ पश्यति ॥ ३१ ॥
प्रथम पटलमें दोष स्थित होनेसे वह पुरुष अव्यक्तरूप ( घटपटादि पदार्थ ) देखे ।
दृष्टिका प्रमाण सुश्रुतमें कहा है, यथा-
मसूरदलमात्रं तु पंचभूतप्रसादजम् ।
आधे मसूरदलके समान पञ्चभूत ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ) से
प्रगट है । शंका-इस श्लोकमें तो मसूरदलके समान लिखा है फिर आधे मसूरके
समान ऐसा अर्थ आपने कैसे किया ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु यह
अर्थ हमने निमि आचार्य्यके मतसे लिखा है। यथा-" पंचभूतात्मिका दृष्टिर्मसूरार्द्ध-
दलोन्मिता " इति ।
अब कहते हैं कि मण्डल चार हैं सो सुश्रुतमें लिखा है, यथा-
तेजोजलाश्रितं बाह्ये तेष्वन्यत्पिशिताश्रितम् ।
मेदस्तृतीयं पटलमाश्रितं त्वस्थि चापरम् ॥
पञ्चमांशसमं दृष्टेस्तेषां बाहुल्यमिष्यते ॥ ३२ ॥
१ अजकाजातका भेद विदेह दूसरा कहता है । यथा-कृष्णैरक्षणोर्भवेच्छुक्रं छागलीविट्-
समप्रभम् । सांद्रपिच्छिलरक्तास्रात्रित्वग्गा त्वजकेति सः ॥
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