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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 404 में से

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पृष्ठ 330

( ३१२ ) माधवनिदान ।
असाध्य लक्षण ।
सर्व एव प्रतिश्याया नरस्याप्रतिकारिणः ।
दुष्टतां यान्ति कालेन तदासाध्या भवन्ति च ॥ २७॥
मूर्च्छन्ति कृमयश्चात्र श्वेताः स्निग्धास्तथाऽणवः ।
कृमिजो यः शिरोरोगस्तुल्यं तेनास्य लक्षणम् ॥ २८ ॥
सर्व पीनस औषधी न करनेसे असाध्य होते हैं, इसमें नाकमें कीडे पड जायँ
वे कृमि सफेद और चिकने और बारीक होते हैं । कृमिज शिरोरोगोंके सदृश
लक्षण होयँ, कृमिज शिरोरोगके लक्षण शिरोरोगमें कह आये हैं ॥
प्रतिश्याय और विकारोंको भी करता है, उनको कहते हैं-
बाधिर्यमान्ध्यमघ्रात्वं घोरांश्च नयनामयान् ।
शोथाग्निससादकासादीन् वृद्धाः कुर्वन्ति पीनसाः ॥ २९ ॥
पीनस बढनेसे बहरा होजाय, मन्द दीखे, वास आवे नहीं, भयंकर नेत्र रोग
होय, सूजन मंदाग्नि खांसी इत्यादि विकार होते हैं ॥
सुश्रुतमें नासिकाके ३१ रोग कहे हैं और इस जगह पीनससे लेकर प्रतिश्या-
यपर्यन्त १५ रोग कहे हैं, बाकी १६ रोगोंको संख्यापूरणके वास्ते लिखते हैं ॥
अर्बुदं सप्तधा शोथाश्चत्वारोऽर्शश्चतुर्विधम् ।
चतुर्विधं रक्तपित्तमुक्तं घ्राणेऽपि तद्विदुः ॥ ३० ॥
सात प्रकारके अर्बुद रोग, चार प्रकारके शोथ ( सूजन ), चार प्रकारके अर्श
और चार प्रकारके रक्तपित्त ये पूर्वोक्त कहे रोग सोलह होते हैं । वात, पित्त, कफ,
रुधिर, मांस, मेदकरके छः हुए और सातवां शालाक्यसिद्धांतके मतसे सन्निपातका
ऐसे सात प्रकारके अर्बुदरोग हुए । वात पित्त कफ सन्निपातके भेदसे चार प्रकारकी,
( सूजन ) भई तथा वात पित्त कफ सन्निपातके भेदसे चारही प्रकारकी अर्श
( बवासीर ) और चारही प्रकारका रक्त रक्तपित्तकी समानतासे एक ही जानना
पूर्वोक्त पीनससे लेकर प्रतिश्यायपर्यन्त १५ भये और अर्बुदादि १६ हुए ऐसे सब
मिलकर नासिकारोग ३१ हुए ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां
नासिकारोगनिदानं समाप्तम् ॥
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