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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 404 में से

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पृष्ठ 323

भाषाटीकासमेत । ( ३०५ )
कर्णशोथ कर्णार्बुद कर्णार्शका हवाला देते हैं-
कर्णशोथार्बुदार्शांसि जानीयादुक्तलक्षणैः ॥ १३ ॥
कानकी सूजन, कानका अर्बुद और कानकी अर्श ( बवासीर ) ये रोग होयें तो
इनके लक्षण उसी २ निदानके द्वारा जानले, कुछ थोडेसे यहां लिखभी देते हैं-कर्ण-
शोथ चार प्रकारका है-वात, पित्त, कफ, रक्तजके भेदसे । इसी प्रकार कर्णार्श
कानकी बवासीर भी चार ही प्रकारकी है, चारसे विशेष शोथ अर्शका होना अस-
म्भव है इससे चारही हैं । कर्णार्बुदरोग सात प्रकारका है-वात, पित्त, कफ, रुधिर,
मांस, मेदा और शिरा इनके भेदसे ॥
अब कहते हैं कि, कर्णरोग सुश्रुतके मतसे २८ प्रकारका है परन्तु चरकके
मतसे उसके चारही भेद हैं, उनको कहते हैं-
वातजके लक्षण ।
नादोऽतिरुक्कर्णमलस्य शोषः स्रावस्तनुश्चाश्रवणं च वातात् ।
बादीसे कानमें शब्द होय, पीडा होय, कानका मैल सूख जाय, पतला स्राव
होय, सुनाई नहीं देवे अर्थात् बहरा हो जाय ॥
पित्तजके लक्षण ।
शोथः सरागो दरणं विदाहः सपीतपूतिस्रवणं च पित्तात् ॥ १४ ॥
पित्तसे कानमें सूजन हो, कान लाल हो, दाह हो, चिरासा हो जाय तथा किंचित्
पीला दुर्गन्धयुक्त स्राव होय ॥
कफजके लक्षण ।
वैश्रुत्यकण्डूस्थिरशोथशुक्ला स्निग्धा स्रुतिः श्लेष्मभवेऽतिरुक् च ।
कफके प्रभावसे विरुद्ध सुनना, खुजली चले, कठिन सूजन होय, सफेद और
चिकना ऐसा स्राव होय ॥
सन्निपातजके लक्षण ।
सर्वाणि रूपाणि च सन्निपातात्स्रावश्च तत्राधिकदोषवर्णः ॥ १५ ॥
सन्निपातसे सब लक्षण होयें, स्राव होय वा जौनसा दोष अधिक होय वैसाही
दोषानुसार वर्णका स्राव होय ॥
कर्णपालीके रोग ।
कर्णशोथके लक्षण ।
सौकुमार्याच्चिरोत्सृष्टे सहसापि प्रवर्धिते ।
कर्णशोथो भवेत्पाल्यां सरुजः परिपोटवान् ॥ १६ ॥
सुकुमार स्त्री अथवा बालक कानकी लौरको एक साथ बहुत बढ़ावै तौ कानकी
पाली ( लौर ) में सूजन होकर फूल जावे और दूखे ॥
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