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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 404 में से

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पृष्ठ 316

( २९८ ) माधवनिदान ।
पित्तजाके लक्षण ।
क्षिप्रोद्गमा क्षिप्रविदाहपाका तीव्रज्वरा पित्तनिमित्तजाता ।
पित्तसे प्रगटभई रोहिणी शीघ्र बढे, शीघ्र ही पके, उसके योगसे तीव्र ज्वर होय ॥
कफजाके लक्षण ।
स्रोतो निरोधिन्त्यपि मन्दपाका स्थिराङ्कुरा या कफसंभवा सा ॥४४॥
जो रोहिणी कण्ठके मार्गको रोध करे ( रोक दे ) तथा हौले हौले पके तथा
जिसके अंकुर कठिन होयँ वह कफजन्य जाननी ॥
त्रिदोषजाके लक्षण ।
गम्भीरपाकिन्यनिवार्यवीर्या त्रिदोषलिङ्गा त्रितयोत्थिता सा।
त्रिदोषसे उत्पन्न भई रोहिणी गंभीरपाकिनी ( जिसमें राध बहुत हो ) तिसमें
औषधिका प्रभाव नहीं चले और तीन दोषोंके लक्षणोंसे युक्त होय, यह तत्काल
प्राणोंका हरण करे ॥
रक्तजाके लक्षण ।
स्फोटैश्चिता पित्तसमानलिङ्गा साध्या प्रदिष्टा रुधिरात्मका तु॥४५॥
रुधिरकी रोहिणी पित्तरोगिणीके समान, फोडोंसे व्याप्त होय। यह साध्य है ॥
कण्ठशालूकके लक्षण ।
कोलास्थिमात्रः कफसंभवो यो ग्रन्थिर्गले कण्टकशूकभूतः ।
खरः स्थिरः शस्त्रनिपातसाध्यस्तं कण्ठशालूकमिति ब्रुवन्ति ॥४६॥
कफसे गलेमें बेरकी गुठलीके समान गांठ होय, उसमें बारीक कांटे ( शूक )
तारके छेदनकीसी पीडा होय अथवा कांटे और शूकके सदृश गलेमें मालूम
होय तथा खरदरी और कठिन होय, यह रोग शस्त्रोंसे साध्य होय, इस रोगको
कंठशालूक कहते हैं ॥
अधिजिह्वके लक्षण ।
जिह्वाग्ररूपः श्वयथुः कफात्तु जिह्वोपरिष्टादपि रक्तमिश्रात् ।
ज्ञेयोऽधिजिह्वः खलु रोग एष विवर्जयेदागतपाकमेनम् ॥ ४७ ॥
रक्तमिश्रित कफसे जीभके अग्रभाग सदृश जीभमें सूजन होय, इसको अधिजिह्व
कहते हैं । यह पकनेसे असाध्य जानना ॥
वलयके लक्षण ।
बलास एवायतमुन्नतं च ग्रन्थि करोत्यन्नगतिं निवार्य ।
तं सर्वथैवाप्रतिवार्यवीर्यं विवर्जनीयं वलयं वदन्ति ॥ ४८ ॥

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