माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 311, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २९३ )
अधिमांसकके लक्षण ।
हन्वोः पश्चिमे दन्ते महाञ्शोथो महारुजः ।
लालास्रावी कफकृतो विज्ञेयो ह्यधिमांसकः ॥ २३ ॥
जिसके पीछेके दाढके नीचे अर्थात् मसूढेंमें बहुत सूजन होय और घोर पीडा होय
तथा लार बहुत बहे, उसको अधिमांसक कहते हैं । यह कफके कोपसे होय है ॥
नाडीव्रणके लक्षण ।
दन्तमूलगता नाड्यः पञ्च ज्ञेया यथेरिताः ॥ २४ ॥
नाडीव्रणनिदानमें वात, पित्त, कफ, सन्निपात और आगन्तुज ऐसे पांच
प्रकारके जो नाडी व्रण कहे हैं वे दन्तमूल (मसूढे) में होते हैं। पहिले ११ और
५ नाडीव्रण ऐसे मिलकर १६ दन्तमूल (मसूढे) के रोग होते हैं परन्तु कराल-
रोग सुश्रुतके मतसे अधिक है तथापि संग्रहकारने अपने ग्रन्थमें लिखा है, इसीसे
हमने भी यहां लिखदिया है, ये पांच नाडीव्रण शालाक्य सिद्धान्तके मतसे संख्या
पूरणार्थ माधवाचार्यने लिखे हैं ॥
दन्तगत ८ रोग ।
दालनके लक्षण ।
दीर्यमाणेष्विव रुजा यस्य दन्तेषु जायते ।
दालनो नाम स व्याधिः सदागतिनिमित्तजः ॥ २५ ॥
जिसके दांतोंमें फोडनेकीसी पीडा होय, उसको दालनरोग कहते हैं, यह रोग
वादीसे होय है ॥
कृमिदन्तकके लक्षण ।
कृष्णाच्छिद्रश्चलस्रावी ससंरम्भो महारुजः ।
अनिमित्तरुजो वातात्स ज्ञेयः कृमिदन्तकः ॥ २६ ॥
वादीके योगसे दांतोंमें काले छिद्र पड जायें, हलने लगे, उनमेंसे स्राव होय,
शोथयुक्त पीडा होनेवाला और कारण बिना दूखनेवाला ऐसा होय उसको कृमि-
दन्तरोग कहते हैं । यहां काले छिद्र पडनेका यह कारण है कि, दुष्ट रुधिरसे कृमि
( कीडे ) पैदा होकर दांतोंमें छिद्र करते हैं ॥
भञ्जनकके लक्षण ।
वक्त्रं वक्रं भवेद्यस्य दन्तभङ्गश्च जायते ।
कफवातकृतो व्याधिः स भंजनकसंज्ञितः ॥ २७ ॥
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