सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 302

( २४४ ) माधवनिदान ।
पद्मिनीकण्टकके लक्षण ।
कण्टकैराचितं वृत्तं मंडलं पाण्डु कण्डुरम् ।
पद्मिनीकण्टकप्रख्यैस्तदाख्यं कफवातजम् ॥ ३३ ॥
कमलके कांटेके समान कांटे चारोंओर युक्त हों, गोल, पीले रंगका, खुजली
जिसमें चलती होय ऐसा एक मण्डल होय उसको पद्मिनीकण्टक कहते हैं, यह
कफवायुसे होय है ॥
जतुमणि ( लहसन ) के लक्षण ।
सममुत्सन्नमरुजं मण्डलं कफरक्तजम् ।
सहजं लक्ष्म चैकेषां लक्ष्यो जतुमणिः स्मृतः ॥ ३४ ॥
कफरक्तसे जन्मसे ही चिकना तथा कुछ ऊंचा, जिसमें पीडा होय नहीं ऐसे
गोल मण्डलके समान देहमें चिह्न होय उसको लक्ष्म तथा कोई कोई लक्ष्य जतु-
मणि कहते हैं । यह स्त्रीपुरुषोंके अंगभेद करके शुभाशुभ फलदायक है, इसको लोकमें
( लहसन ) कहते हैं ॥
माष ( मस्सा ) के लक्षण ।
अवेदनं स्थिरं चैव यस्मिन् गात्रे प्रदृश्यते ।
माषवत्कृष्णमुत्सन्नमनिलान्मषकं तु तत् ॥ ३५ ॥
बादीसे शरीरके ऊपर उडदके समान काला, पीडारहित, स्थिर, कठिन, कुछ
ऊंची गांठसी प्रगट होय, उसको माष ( मस्सा ) ऐसे कहते हैं । इस श्लोकमें जो
चकार है उससे कफमेदसे भी मस्से होते हैं यह दिखाया, सो भोजने कहा भी है ॥
तिलकालक ( तिल ) के लक्षण ।
कृष्णानि तिलमात्राणि नीरुजानि समानि च ।
वातपित्तकफोन्सेकात्तान्विद्यात्तिलकालकान् ॥ ३६ ॥
वात पित्त कफके कोपसे काले तिलके समान पीडारहित त्वचासे मिले, ऐसे
अंगमें दाग होयँ उनको तिलकालक (तिल) कहते हैं । “ वातपित्तकफोन्सेकात् ” इस
पाठमें वात पित्त हेतु करके कफका शोष होय है उसीसे तिल होते हैं परन्तु चरकके
मतसे पित्त रुधिरके शोष होनेसे तिल होते हैं । “ यस्य पित्तं प्रकुपितं शोणितं
प्राप्य शुष्यति । तिलको विप्लवा व्यंगा नीलिका चास्य जायते ॥ ” इस वचनसे
वात भी रुधिरको शोषण करे है । अन्य ग्रन्थमें वात पित्त कफ ये तीनों रुधिरको
१ वातोत्तरैस्ते त्वचि यदा दूष्येते कफमेदसी । श्लक्ष्ण मृदु सवर्णं च कुरुते मषकं वदेत् ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA