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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 404 में से

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पृष्ठ 278

( २६० ) माधवनिदान ।
किलासके असाध्य लक्षण ।
गुह्यपाणितलौष्ठेषु जातमप्यचिरन्तनम् ।
वर्जनीयं विशेषेण किलासं सिद्धिमिच्छता ॥ ४२ ॥
गुदास्थानमें, हाथोंमें, पैरोंके तलुओंमें, होठोंमें प्रगट भया किलास कुष्ठ थोडे
दिनका होय तौ भी यश मिलनेकी इच्छावाला वैद्य छोड दे ॥
सांसर्गिक रोग ।
प्रसङ्गाद्गात्रसंस्पर्शान्निःश्वासात्सहभोजनात् ।
सहशय्यासनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात् ॥ ४३ ॥
कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च ।
औपसर्गिकरोगाश्च संक्रामन्ति नरान्नरम् ॥ ४४ ॥
मैथुनादि प्रसंगसे अथवा शरीरके स्पर्शसे, श्वासके लगनेसे, साथ बैठकर एक-
पात्रमें भोजन करनेसे, एक साथ एक शय्या ( पलंग ) पर सोनेसे तथा एकसाथ
मिलकर बैठनेसे, पास रहनेसे, धारण कियेहुए वस्त्रको धारण करनेसे, सूंघे हुए
पुष्पको सूंघनेसे अथवा पहरीहुई मालाको धारण करनेसे, लगायेहुए चन्दनमेंसे
चन्दन लगानेसे कोढ ज्वर धातुशोष ( क्षयी रोग ), नेत्ररोग ( आंख दुखना )
औपसर्गिक रोग कहिये शीतलादिक और भूतोपसर्गादिक ये सांक्रामिकरोग एक
पुरुषसे उडकर दूसरे मनुष्यके हो जाते हैं, इसीसे पूर्वोक्त रोगियोंका प्रसंगा-
दिक न करे ॥ ४४ ॥
म्रियते यदि कुष्ठेन पुनर्जातस्य तद्भवेत् ।
नातो निन्द्यतरो रोगो यथा कुष्ठं प्रकीर्तितम् ॥ ४५ ॥
कुष्ठरोगी मरै तौ फिर उसके दूसरे जन्ममें यह कुष्ठरोग होय है, इस कुष्ठ-
रोगके समान और दूसरा निंद्यरोग नहीं है। कुष्ठरोगकी निरुक्ति-“ कुत्सितं तिष्ठ-
तीति ” । “ कुष्ठं भेषजरोगयोः ” इति हैमः ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां
कुष्ठरोगनिदानं समाप्तम् ॥
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