माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( २२८ ) माधवनिदान ।
एक दोषसे सूजन उत्पन्न होय उसमें पकनेके समय तीनोंका सम्बन्ध होय है ।
नर्त्तेऽनिलाद्रुङ्न बिना न पित्तं पाकः कफं वापि बिना न पूयः ।
तस्माद्धि सर्वे परिपाककाले पचन्ति शोथास्त्रिभिरेव दोषैः ॥ १२ ॥
बादीके बिना पीडा नहीं होय, पित्तके विना पाक नहीं होय और कफके विना
राध नहीं होय अर्थात् पकनेके समय तीनों दोषोंके मिलनेसे सब प्रकारकी सूजन
पकती है । रक्तपाकलक्षण ग्रन्थांतरोंमें कहे हैं, यथा—“ कफजेषु च शोथेषु
गम्भीरं पाकमेत्यसृक् । पक्वं स्निग्धं ततः स्पष्टं यत्र स्यात्क्लिन्नशोफता ॥ त्वक्सावर्ण्य
रुजोऽल्पत्वं घनस्पर्शित्वमश्मवत् । रक्तपाकमिति ब्रूयात्तं प्राज्ञो मुक्तसंशयः ॥”
राध न निकालनेसे जो परिणाम होय है उसको दृष्टांत देकर कहते हैं-
कक्षं समासाद्य यथैव वह्निर्वाय्वीरितः संदहति प्रसह्य ।
तथैव पूयोऽप्यविनिःसृतो हि मांसं शिराः स्नायु च खादतीह ॥१३॥
फूँसके गंजमें लगीहुई आग पवनकी सहायता पाकर जैसे वह फूँसको जलाकर
खाक करदे उसी प्रकार व्रणमें राध न निकालनेसे वह राध मांस, शिरा और स्नायु
इनको खाय लेती है ॥
आमादि लक्षणज्ञानसे वैद्यके गुणदोष दिखाते हैं—
आमं विदह्यमानं च सम्यक् पक्वं च यो भिषक् ।
जानीयात्स भवेद्वैद्यः शेषास्तस्करवृत्तयः ॥ १४ ॥
आम ( कच्चा ) पच्यमान और जो अच्छी रीतिसे पकगया हो ऐसे व्रणके लक्षण
जो वैद्य जाने है, उसीको वैद्य जानना चाहिये, बाकी सब चोर हैं ॥
अपक्वका छेदन और पकेकी उपेक्षा करनेमें दोष ।
यश्छिनत्त्याममज्ञानाद्यश्च पक्वमुपेक्षते ।
श्वपचाविव मन्तव्यौ तावनिश्चितकारिणौ ॥ १५ ॥
जो अज्ञानसे कच्चे फोडेको पका समझकर फोडे और जो पके फोडेको कच्चा
समझकर चीरे नहीं ये दोनों अविचारवान् वैद्य चांडालके समान जानने ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्धदीपिकामाथुरी-
भाषाटीकायां व्रणशोथनिदानं समाप्तम् ॥