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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 404 में से

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पृष्ठ 218

( २०० ) माधवनिदान ।
अग्नि मन्द होनेसे सब रोग होते हैं और उदर रोग तो विशेषकरके होय है । कारण
यह है कि अग्निमांद्य यह त्रिदोषजनक है और अजीर्णसे, मलिन अन्न ( विरुद्ध-
अध्यशनादिक ) से और मल ( दोष तथा पुरीषादिक ) इनके संचयसे उदररोग होय
है । इस जगह उदरशब्दकरके उदरस्थित रोग जानने, सो ग्रन्थान्तरमें लिखे हैं ॥
उदरकी सम्प्राप्ति ।
रुद्धां स्वेदोम्बुवाहीनि दोषाः स्रोतांसि सञ्चिताः ।
प्राणाग्न्यपानान्संदूष्य जनयन्त्युदरं नृणाम् ॥ २ ॥
वातादिदोष स्वेद ( पसीना ) बहनेवाली और जलको बहनेवाली नाड़ियोंके
मार्गको रुद्ध ( रोक ) कर और वे दोष बढकर प्राणवायु, अग्नि और अपानवायु
इनको अत्यन्त दुष्ट कर मनुष्योंके उदररोग उत्पन्न करैं हैं । उदररोगका पूर्वरूप
सुश्रुतमें लिखा है-“ तत्पूर्वरूपं बलवर्णाकांक्षा वलीविनाशो जठरे तु राज्यः । जीर्णा-
परिज्ञानविदाहवत्यो बस्तौ रुजः पादगतश्च शोथः ॥”
उदरके सामान्यरूप ।
आध्मानं गमनेऽशक्तिर्दौर्बल्यं दुर्बलाग्निता ।
शोथः सदनमङ्गानां सङ्गो वातपुरीषयोः ॥
दाहस्तन्द्रा च सर्वेषु जठरेषु भवन्ति हि ॥ ३ ॥
अफरा, चलनेकी शक्तिका नाश, दुर्बलता, मन्दाग्नि, सूजन, अंगग्लानि, वायुका
तथा मलका रुकना, दाह, तन्द्रा ये लक्षण सब उदरमें होते हैं ॥
उदररोगकी संख्या ।
पृथग्दोषैः समस्तैश्च प्लीहबद्धक्षतोदकैः ।
संभवन्त्युदराण्यष्टौ तेषां लिङ्गं पृथक्शृणु ॥ ४ ॥
पृथक् दोषोंसे अर्थात् वातसे, पित्तसे, कफसे, सन्निपातसे ( सन्निपातोदर ),
प्लीहोदर, बद्धोदर, क्षतोदर और जलोदर सब मिलाकर ८ भये । उनके लक्षण
पृथक् पृथक् कहते हैं ॥
वातोदरके लक्षण ।
तत्र वातोदरे शोथः पाणिपन्नाभिकुक्षिषु ।
कुक्षिपार्श्वोदरकटीपृष्ठरुक्पर्वभेदनम् ॥ ५ ॥
१ स्रोतोरोधश्चात्र बाहिरेव न पुनरन्तः । यदुक्तं चरके-“ स्वेदस्तु बाह्येषु स्रोतःसु
प्रतिहतगतिस्तिर्यगवतिष्ठमानस्तदेवोदकमाप्यायति ” अतएवोदरपूर्णता अन्नरसेन भवति ।
२ स्वेदाम्बुवहानां स्रोतसां भेदानाह-स्वेदवहानां मेदोमूलं लोमकूपश्च, उदकवहानां स्रोतसां
तालूमूलं क्लोम च ।
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