माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 20, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( २ ) माधवनिदान ।
रोगविनिश्चय नाम ग्रन्थकी रचना करता हूँ। जिसमें उपद्रव, अरिष्ट, निदान और
लिंग ( चिह्न ) इनका लक्षण अच्छी रीतिसे किया गया है ॥
शिष्य-यह अतिसूक्ष्म निदानपंचक सर्वत्र ऋषिमुनियोंके जानने योग्य है उनके
वाक्योंका निरादर कर मनुष्यकृत तुम्हारे ग्रन्थमें मनुष्योंकी कैसे प्रवृत्ति होवेगी ?
इस कारण माधवाचार्यने-" नानामुनीनां वचनैः " इस पदको धरा अर्थात् अनेक
मुनीश्वरोंके वचनोंका आशय ले मैंने यह ग्रन्थ निर्माण किया है, किंतु मेरे मनकी
उक्तिसे कल्पित नहीं है। शंका-पहले ही बहुत ग्रन्थ निर्माण करे उपस्थित हैं फिर
तुम्हारे इस ग्रन्थको कौन पढ़ेगा ? इस कारण माधवाचार्यने " इदानीम् " पद
मूलमें धरा । इस पदका यह आशय है कि, हम ही अनेक मुनीश्वरोंके वचनोंसे अब
ऐसा अलौकिक ग्रन्थ रचते हैं कि, पहिले किसी आचार्यने अद्यापि नहीं निर्माण
करा । कोई वादी शंका करे कि, तुमने ग्रन्थ रचा भी परन्तु किसीने नहीं पढ़ा तो
आपका ग्रन्थ निर्माण करना व्यर्थ होगा, इस कारण माधवाचार्यने " सद्धिषजां
नियोगात् " यह पद धरा. इस पदका आशय यह है कि, हमारे पढनेके निमित्त
कोई निदानग्रन्थ निर्माण करो ऐसे बुद्धिमान् वैद्योंके कहनेसे इस ग्रन्थकी रचना
की है। शंका-श्रीमहादेवजीके हर मृड रुद्र शम्भु इत्यादि नामोंको त्यागकर शिव
इस नामको क्यों प्रणाम करा ? उत्तर-इस रोगविनिश्चय ग्रन्थके पठन पाठन
करनेवालोंके कल्याणकी इच्छा कर सब कामना देनेवाला कल्याणवाचक शिवनाम
विचार इसीको ग्रन्थके आदिमें माधवाचार्यने प्रणाम करा ॥
अन्य निदानग्रन्थोंसे इसकी उत्तमता दिखाते हैं-
नानातंत्रविहीनानां भिषजामल्पमेधसाम् ।
सुखं विज्ञातुमातङ्कमयमेव भविष्यति ॥ ३ ॥
अयमेव ( ग्रन्थः ) अल्पमेधसां भिषजां सुखं यथा भवति तथा आतङ्कं विज्ञातुं
भविष्यति । किविशिष्टानां भिषजां नानान्त्रविहीनानामित्यन्वयः ॥
अनेक ग्रन्थोंके विचार करनेमें असमर्थ ऐसे मन्दबुद्धिवाले वैद्योंको सुखपूर्वक
रोगाँनके निमित्त यही ग्रन्थ कारण होवेगा. क्योंकि, रोगके जाननाही मुख्य है सो
अन्यान्तरोंमें लिखा भी है ॥
१ उपद्रवः-रोगारम्भदोषप्रकोपजन्योऽन्यविकारः।२ अरिष्टम्-नियत मरणख्यापकं लिंगम् ।
३ निदानम्-रोगोत्पादको हेतुः । ४ लिङ्गम्-रोगख्यापको हेतुः तेन लिंग्यते ज्ञायते व्याधिरने-
नेति व्युत्पत्त्या पूर्वरूपरूपोपशयसंप्राप्तयो विज्ञायन्ते । ५ रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौष-
धम् । ततः कर्म भिषक्पश्चाज्ज्ञानपूर्वं समाचरेत् ॥ १ ॥ रोगज्ञानार्थमप्रवादौ यत्नः कार्यो
भिषग्वरैः । सति तस्मिन्क्रियारम्भः पुण्याय यशसे श्रिये ॥ २ ॥