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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 404 में से

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पृष्ठ 173

भाषाटीकासमेत । ( १५५ )
विसर्परोग, दाह, शूल, मलमूत्रका निरोध, मूर्च्छा, अरुचि, मंदाग्नि इन लक्षण-
युक्त जो और बलक्षीण होगया होय ऐसे पुरुषोंको पक्षवधादिक विकार मारक
अर्थात् प्राणके हरणकर्त्ता होते हैं ॥
असाध्य लक्षण ।
शूनं सुप्तत्वचं भग्नं कम्पाध्माननिपीडितम् ।
रुजार्त्तिमन्तं च नरं वातव्याधिर्विनाशयेत् ॥ ८० ॥
सूजनवाला, जिसकी त्वचा सोईगई होय अर्थात् जिसको स्पर्श होनेका ज्ञान न
होय, जिसकी हड्डी टूटगई होय, कम्प और अफरा इनसे अत्यन्त पीडित होय, रुजा
और आर्ति कहिये शूलयुक्त ऐसे मनुष्यको यह वातव्याधिरोग नाश करता है ॥
अब पांच प्रकारकी प्रकृतिस्थ वायुके लक्षण और कार्य कहते हैं—
अव्याहतगतिर्यस्य स्थानस्थः प्रकृतौ स्थितः ।
वायुः स्यात्सोऽधिकं जीवेद्वीतरोगः समाः शतम् ॥ ८१ ॥
जिस पुरुषकी वायु अव्याहतगति और अपने आश्रयसे रहनेवाली और प्रकृति-
स्थित कहिये न वृद्ध क्षीण होय, वह पुरुष निरोगी होकर “ अधिकं समाः शतम्”
कहिये एक सौ बीस वर्ष और पांच दिन पर्यन्त जीवे ॥
इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
वातव्याधिनिदानं समाप्तम् ॥
अथ वातरक्तनिदानम् ।
शंका-क्योंजी ! सुश्रुतने तो वातव्याधि अध्यायमें वातरक्त कहा है फिर माध-
वने पृथक् क्यों कहा है ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है, परन्तु क्रियाविशेष ज्ञाप-
नार्थ माधवने अलग लिखा है और इसी रीतिसे चरकमें भी वातव्याधि अध्यायके
पीछे वातरक्ताध्याय कहा है ॥
लवणाम्लकटुक्षारस्निग्धोष्णाजीर्णभोजनैः । क्लिन्नशुष्काम्बुजा-
नूपमांसपिण्याकमूलकैः ॥१॥ कुलित्थमषनिष्पावशाकादि-
पललेक्षुभिः । दध्यारनालसौवीरसूक्ततक्रसुरासवैः ॥ २ ॥
विरुद्धाध्यशनक्रोधदिवास्वप्नप्रजागरैः। प्रायशः सुकुमाराणां