माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( १४९ )
करोति विवृतास्यत्वमथवा संवृतास्यताम् ।
हनुग्रहः स तेन स्यात्कृच्छ्राच्चर्वणभाषणम् ॥ ५० ॥
जिह्वाके अतिघर्षण करनेसे, चना आदि सूखी वस्तुके खानेसे अथवा किसी
प्रकार चोटके लगनेसे हनुमूल ( कपोल ) के अर्थात् डाढकी जड़में रहनेवाली
जो वायु सो कुपित होकर हनुमूलको नीचे कर मुखको खुला ही रखदे अथवा
मुखको बन्द करदे, उसको हनुग्रहरोग कहते हैं । तब उस मनुष्यका खाना बोलना
कठिनतासे होय ॥
मन्यास्तम्भके लक्षण ।
दिवास्वप्नासमस्थानविकृतोर्ध्वनिरीक्षणैः ।
मन्यास्तम्भं प्रकुरुते स एव श्लेष्मणा युतः ॥ ५१ ॥
दिनमें सोनेसे, नीचे ऊंचे स्थानमें सोनेसे, ऊंचेको विकृतिपूर्वक देखनेसे इन
कारणोंसे कोपको प्राप्त भई जो वात सो कफयुक्त होकर मन्या ( नाड़ी ) स्तंभन
करे, इस रोगको मन्यास्तंभरोग कहते हैं ॥
जिह्वास्तम्भके लक्षण ।
वाग्वाहिनीशिरासंस्थो जिह्वां स्तम्भयतेऽनिलः ।
जिह्वास्तम्भः स तेनान्नपानवाक्येष्वनीशता ॥ ५२ ॥
वायु वाणीके बहनेवाली नाडियोंमें प्राप्त हो जिह्वाका स्तंभन करदे, उसको जिह्वा
स्तंभ कहते हैं। यह अन्नपानकी तथा बोलनेकी सामर्थ्यका नाश करती है ॥
शिराग्रहके लक्षण ।
रक्तमाश्रित्य पवनः कुर्यान्मूर्धधराः शिराः ।
रूक्षाः सवेदनाः कृष्णाः सोऽसाध्यः स्याच्छिराग्रहः ॥ ५३ ॥
वायु रुधिरका आश्रयकर मस्तकके धारण करनेवाली नाडीको रूखी पीडायुक्त
और काली करदे, यह शिराग्रहरोग असाध्य है ॥
गृध्रसीके लक्षण ।
स्फिक्पूर्वा कटिपृष्ठोरुजानुजङ्घापदं क्रमात् ।
गृध्रसी स्तंभरुक्तोदैर्गृह्णाति स्पन्दते मुहुः ॥ ५४ ॥
वाताद्वातकफात्तन्द्रागौरवारोचकान्विता ॥ ५५ ॥
१ मन्या-गलेकी नाड़ीको कहते हैं। २ 'शिरोग्रहः' ऐसा भी पाठ है।
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