सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159

भाषाटीकासमेत । ( १४१ )
भेदस्तोदोऽर्त्तिराक्षेपो मोहश्चायास एव च ॥ ८ ॥ एवंविधानि
रूपाणि करोति कुपितोऽनिलः । हेतुस्थानविशेषाच्च भवे-
द्रोगविशेषकृत् ॥ ९ ॥
संधियोंका संकोच और स्तंभ, हड्डियों और सन्धियोंमें फूटनेकीसी पीडा,
रोमांच, बाहियात बकना, हाथ पैर और मुख इनका जकडजाना, खंजत्व, पांगुला
होना, कुबडापना, अङ्गोंका सूखना, निद्राका नाश, गर्भका न रहना, शुक्र और रज
(स्त्रीका आर्त्तव) इनका नाश, कंप, अङ्गोंमें शून्यता, मस्तक, नाक, मुख, जत्रु और
नाड इनका भीतर जाना, अथवा टेढे होजाय, भेदसदृश पीडा, नोचनेकीसी पीडा,
शूल, आक्षेपरोग जा आगे कहेंगे, मोह, श्रम, कुपित भई जो वायु इस प्रकार
लक्षण करे है, वह वायु हेतु और स्थान इन भेदसे विशिष्ट रोग उत्पन्न करनेवाली
होती है । जैसे कफावृत होनेसे मन्यास्तम्भ रोग करे । यदि पक्वाशयमें वात स्थित
होय तो आंतोंका गूंजना इत्यादि रोग करै है ॥
कोष्ठाश्रितवायुके कार्य ।
तत्र कोष्ठाश्रिते दुष्टे निग्रहो मूत्रवर्चसोः ।
ब्रध्नहृद्रोगगुल्मार्शः पार्श्वशूलं च मारुते ॥ १० ॥
कोठेमें स्थित वायु दुष्ट होनेसे मलमूत्रका अवरोध होय, बदरोग, हृद्रोग, गोला
बवासीर और पसवाडोंमें पीडा इतने रोग उत्पन्न करे ॥
सर्वांगकुपित वायुके कार्य
सर्वाङ्गकुपिते वाते गात्रस्फुरणजृम्भणम् ।
वेदनाभिः परीतस्य स्फुटन्तीवास्य सन्धयः ॥ ११ ॥
सब अंगकी वायु कुपित होनेसे अंगोंका फरकना, जम्भाई और सन्धि वेदना-
युक्त हो फूटनेकीसी पीडा होय ॥
गुदामें स्थित वायुके कार्य ।
ग्रहो विण्मूत्रवातानां शूलाध्मानाश्मशर्कराः ।
जंघोरुत्रिकपत्पृष्ठरोगशोफौ गुदस्थिते ॥ १२ ॥
वायु गुदामें स्थित होनेसे मल मूत्र और वायुका रुकना, शूल, अफरा, पथरी
शर्करा, जंघा, ऊरु, त्रिकस्थान, पैर, पीठ इनमें पीडा और सूजन ये रोग होते हैं ॥
१ इस जगह गुदाशब्दकरके उत्तरगुदा अर्थात् पक्वाशय जानना, गुदा नहीं जानना
क्योंकि, गुदामें कहे तो उसको अश्मरी ( पथरी ) कर्तृत्व नहीं हो सके ।