सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 268 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

भूमिका ।
ज्योतिषं नयनं स्मृतम् ।
प्रियपाठक गण ! आप सब महाशयोंको विदित ही होगा कि, चारों वर्णोंकी
शिक्षाप्रणाली बतलानेवाली दिव्य पुस्तक वेद है और उसके शिक्षा, कल्प,
व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष यह छ अङ्ग हैं और षडङ्गवेद पढना
ब्राह्मणोंसे लेकर वैश्यों पर्यन्त तीनों वर्णोंका धर्म है। उस ही हमारे शिरोधा-
र्य्य वेदका एक अङ्ग जो ज्योतिष है उसके दो भाग हैं फलित और गणित और
उसमेंसे गणित भाग आजपर्य्यन्त इसी द्वीपमें नहीं किन्तु द्वीपान्तरोंमें भी परम
प्रतिष्ठाका स्थान है, यद्यपि उस सनातन गणितको जाननेवालोंकी संख्या
भारतवर्षमें बहुत थोडी है तथापि कोटिशः धन्यवाद हैं उस ईश्वरको जिसने अपनी
दयालुतासे परम पुनीत विश्वेशपुरी श्रीकाशीक्षेत्रमें गणितशास्त्रके पारङ्गम चन्द्रमाके
समान अपनी कौशल्यकलाओंसे गणितसमुद्रके प्रवाहको बढानेवाले अद्यश्वः
काशिक राजकीय संस्कृत विद्यालयमें गणितशास्त्रके अध्यापक महामहोपाध्याय
श्रीविद्वद्वर्य्य सुधाकरजीको प्रकट किया है और इनहीके कारण मिथिलादेशमें भी
गणितशास्त्रका प्रचार है परन्तु अन्य देशोंपर यदि दृष्टि डालकर देखा जाय तो हमारे
सनातन गणितशास्त्रकों परिपूर्ण रीतिसे जाननेवालोंको मिलना अति कठिन पड
जाता है। यदि कोई गणितके चतुर मिल भी जायं तो प्रायः पढानेमें ध्यान नहीं देते
हैं इस कारण सनातन गणित जाननेकी इच्छा करने वालोंके मनोरथ उत्पन्न होकर
हृदयमें ही लीन हो जातेहैं इस कारण यह दारुण प्रचार दूर करनेके निमित्त मेरे
द्वारा श्रीयुत सेठ-खेमराज श्रीकृष्णदासजीने लीलावतीकी टीका बनवाई है। प्रियवर!
लीलावती वह पुस्तक है, जिसको इस ही द्वीपके नहीं किन्तु द्वीपान्तरके भी आबाल
वृद्ध सब ही विज्ञ पुरुष नामसे जानते हैं। यह पुस्तक आजकल सनातन गणितका
प्रथम सोपान है। इसी कारण सर्वत्र प्रचार करनेके निमित्त उक्त सेठजीके पत्रानुसार
मैंने इस लीलावती ग्रन्थका "स्वरूपप्रकाश" नामकी सान्वय भाषाटीका निर्माण