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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 268 में से

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पृष्ठ 25

गुणनप्रकारः। (९)
५ पांचमें जोड दिया तब ६ छ हुआ; तब १६२० एक हजार छ सौ बीस
फल हुआ.
अथ खण्डगुणा करनेकी रीति-
(सू० ३) गुण्यस्त्वधोऽधो गुणखण्डतुल्य-
स्तैः खंडकैः संगुणितो युतो वा ॥
अन्वयः-वा गुणखंडतुल्यः गुण्यः अधः अधः तैः खंडकैः संगुणितः ततः युतः
फलम् भवति ॥
अर्थः-अथवा गुणकके जितने खंड (टुकडे) कल्पना करे, उतने ही जगह गुण्य
को धरकर और नीचे रक्खे हुए गुणकके खंडोंसे गुण्यको अलग २ गुणा करके जोड
देय तब गुणनफल प्राप्त होता है ॥
न्यासः-अथवा गुणरूपविभागे खंडे कृते ८ । ४
आभ्यां पृथक् गुण्ये गुणिते च जातं तदेव १६२०
फैलाव-अथवा गुणक १२ बारहके दो खंड ८ आठ और ४ चार किये और
१३५ १३५ गुण्य १३५ को दो स्थानोंमें रक्खा और गुणकके दोनों
८ ४ खंडोंको गुण्यके नीचे दो जगह अलग २ रक्खा और अलग २
१०८० ५४० गुणा किया अर्थात् गुण्य १३५ एकसौ पैंतीस को गुणक
१०८० के खण्ड ८ आठसे गुणा किया तब १०८० एक हजार
५४० अस्सी हुए; और दूसरे खण्ड चारसे उसी गुण्य १३५ का
१६२० गुणनफल. गुणा किया तो ५४० पाँचसौ चालीस हुए. दोनों लब्धिका
जोड दिया तब वही १६२० एक हजार छ सौ बीस फल हुआ.
अथ विभाग गुणा करनेकी रीति-
(सू.४) भक्तो गुणः शुद्धयति येन तेन लब्ध्या च गुण्यो
गुणितः फलं वा ॥ ५ ॥
अन्वयः-वा गुणः येन भक्तः सन् शुद्धयति तेन लब्ध्या च गुणितः गुण्यः फलं
भवति ॥ ५ ॥
अर्थः-अथवा गुणकमें किसी अंकका भाग देनेसे यदि निःशेष हो जाय तो
जिसका भाग दिया उस भाजकसे और उस लब्धिसे गुण्यको गुणा करनेसे भी
गुणनफल प्राप्त होता है ॥ ५ ॥